जानिये- कैसे सेंट्रल विस्टा से हर साल बचेंगे 1000 करोड़ रुपये

राजधानी दिल्ली में सेंट्रल विस्टा परियोजना साकार होने पर संसद को न सिर्फ आधुनिक तकनीक से लैस, भूकंपरोधी, तीन गुना बड़ा और खूबसूरत भवन मिलेगा, बल्कि उसी संसद परिसर में केंद्र सरकार के सभी 51 मंत्रालय एक साथ बैठेंगे। इससे सरकार की प्रशासनिक क्षमता बढ़ेगी और काम में सहूलियत होगी। साथ ही विभिन्न मंत्रालयों के दफ्तरों के किराये पर सालाना खर्च होने वाले करीब 1000 करोड़ रुपये की भी बचत होगी। मौजूदा संसद भवन का निर्माण 93 साल पहले 1927 में हुआ था। 1956 में जरूरत के मुताबिक दो मंजिल और बने, लेकिन मौजूद संसद भवन जरूरत के हिसाब से छोटा पड़ रहा है।

मौजूदा भवन में भूकंप, आग आदि से बचाव की भी उचित व्यवस्था नहीं है।

सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में बताया गया कि बदले परिवेश और जरूरत के हिसाब से नए संसद भवन की जरूरत है। 1971 की जनगणना में भारत की जनसंख्या के हिसाब से लोकसभा की 545 सीटें तय की गई थीं। लेकिन, अब जनसंख्या बढ़कर 130 करोड़ को पार कर चुकी है और 2026 में फिर से परिसीमन की प्रक्रिया होगी, जिसमें दोनों सदनों की सीटें काफी बढ़ जाएंगी। इसे देखते हुए संसद में और जगह की जरूरत होगी। संसद के मौजूदा सेंट्रल हाल में अभी 440 लोगों के बैठने की व्यवस्था है। दोनों सदनों के संयुक्त सत्र के दौरान सेंट्रल हाल में सांसदों के बैठने के लिए अलग से कुर्सियां लगानी पड़ती हैं।

इसके अलावा मौजूदा भवन में भूकंप, आग आदि से बचाव की भी उचित व्यवस्था नहीं है। इसे देखते हुए केंद्र सरकार ने संसद के लिए नई इमारत बनाने का निर्णय लिया। करीब 971 करोड़ की सेंट्रल विस्टा परियोजना में नए और बड़े संसद भवन के साथ ही जगह की कमी के कारण अलग अलग इमारतों में चल रहे मंत्रालयों के दफ्तर भी एक जगह आ जाएंगे।

केंद्र सरकार का कहना है कि अभी बहुत से मंत्रालय किराए के भवनों में चलते हैं, जिस पर करीब 1,000 करोड़ रुपये सालाना किराया जाता है, जिसकी बचत होगी। नई परियोजना में एक ही परिसर में 10 इमारतों में केंद्र सरकार के सभी 51 मंत्रालय बैठेंगे और सभी अंडरग्राउंड आवागमन सिस्टम जुड़े रहेंगे।

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