मोदी सरकार के एक फैसले से सही मायने में कश्मीर स्वर्ग बन गया

कश्मीर जिसे धरती का स्वर्ग कहा जाता था आज एक बार फिर से असल माने में स्वर्ग बनता जा रहा है और इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण वहां से धारा 370 का खत्म होना है जिसके बाद आतंक तो वहां कम हुआ ही है साथ ही सरकार की कोशिश के चलते आज वहां से विस्थापित हिंदुओं को उनकी जमीन फिर से मिल रही है, 30 साल बाद घाटी में किसी रोड का नाम पंडितों के नाम पर रखा जा रहा है और तो और कश्मीर के युवक आतंक का रास्ता छोड़कर अमन के रास्ते पर चलने के लिये निकल पड़े हैं।

कश्मीरी विस्थापितों को तीन दशक बाद मिलेगा उनका खोया हक

तीन दशक पहले धर्मांध आतंकियों के कारण अपने घर छोड़कर गए कश्मीरी विस्थापितों में पहली बार न्याय की आस जगी है। कश्मीर में जबरन कब्जाई गई उनकी पुश्तैनी संपत्तियां वापस पाना अब उनके लिए आसान हो गया है। उन्हें अपने हक के लिए यहां-वहां ठोकरें नहीं खानी होंगी। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने विस्थापितों की आनलाइन शिकायत दर्ज कराने के लिए पोर्टल का लोकार्पण किया है। इन शिकायतों का लोकसेवा अधिकार कानून के तहत तय समय में निवारण करना होगा। आपको जानकारी हो कि 1989-90 में जम्मू कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंकवाद की शुरुआत के साथ ही घाटी से बड़ी संख्या में लोगों, विशेषकर कश्मीरी हिंदुओं, को पलायन करना पड़ा। उस हालात में कई लोगों की सपंत्ति पर कब्जा कर लिया या फिर मजबूरी में उन्होंने औने-पौने दाम पर संपत्ति को बेचना पड़ा। उपराज्यपाल ने कहा कि यह सुविधा कश्मीर से बेघर हुए कश्मीरी हिंदुओं, सिखों और मुस्लिमों के लिए बड़ी राहत का काम करेगी। विस्थापित 1990 से जो तकलीफें उठा रहे हैं, उनका अंत इससे होगा।

30 साल में पहली बार कश्मीर में पंडितों के नाम पर सड़क और कालेज

श्रीनगर में जीरो ब्रिज से बख्शी स्टेडियम तक जाने वाली सड़क को अब जिंदा कौल मार्ग नाम से जाना जाएगा। जम्मू कश्मीर सरकार ने साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले पहले कश्मीरी कवि जिंदा कौल के सम्मान में इस सड़क का नाम बदलने का फैसला किया है। जिंदा कौल को आम कश्मीरी मास्टरजी के नाम से जानते हैं। यही नहीं, कुछ कालेजों और स्कूलों के नाम भी कश्मीर के नामी साहित्यकारों और शिक्षाविदों के नाम पर रखे जाने की तैयारी हो चुकी है। इनमें स्वर्गीय मोती लाल केमू, स्वर्गीय प्रो. हामिद कश्मीरी और स्वर्गीय प्रो रियाज पंजाबी शामिल हैं। बीते 30 सालों में यह पहला अवसर है, जब कश्मीर में किसी कश्मीरी पंडित के नाम पर किसी कालेज या मार्ग का नाम रखा जा रहा है। कश्मीरी पंडित समुदाय से संबंधित साहित्यकारों के नाम पर सड़कों और शिक्षण संस्थानों के नामकरण को वादी में कश्मीरी पंडितों की वापसी और कश्मीर के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में उनके योगदान से कश्मीर की युवा पीढ़ी को अवगत कराने की प्रशासनिक कवायद के साथ जोड़कर देखा जा रहा है।

आतंक से मुंह मोड़ने लगे हैं घाटी के युवा

अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद भले ही पाकिस्तान अब जम्मू-कश्मीर में आतंकियों की नई खेप भेजने की तैयारी में जुटा हो, लेकिन हकीकत का दूसरा पहलू यह भी है कि कश्मीर के स्थानीय युवा अब आतंक से मुंह मोड़ने लगे हैं। आतंकी संगठनों में शामिल होने वाले युवाओं की संख्या में आई कमी से यह साफ हो रहा है। 2020 में अगस्त के अंत तक 135 स्थानीय युवा आतंकी संगठनों में शामिल हुए थे, लेकिन इस साल इनकी संख्या 80 से भी कम रह गई है। जिससे पता चलता है कि जिस तरह से कश्मीर में विकास कार्य हो रहे हैं उससे युवा तेजी से जुड़ रहे हैं और वो पुरानी बात को भुलाकर नये कश्मीर को बनाने की कोशिश में जुट भी गये हैं।

जिस तरह से कश्मीर बदल रहा है उससे ये ज्ञात होता है कि जो लोग कश्मीर में फिर पुरानी व्यवस्था की मांग कर रहे हैं वो घाटी की तरक्की को हजम नहीं कर पा रहे हैं और ये तो पक्का है कि कश्मीर की आवाम ऐसे लोगों को जरूर चुनाव के वक्त सबक सिखायेगी।

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