कर्नाटक हाईकोर्ट: हिजाब पहनना इस्‍लाम धर्म की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं, याचिका को किया खारिज

कुछ दिन पहले हिजाब को लेकर सियासत में खूब हंगामा देखा गया। आलम ये था कि कुछ सियासत के माहिर खिलाड़ी इस मुद्दे के जरिये 5 राज्यों में हो रहे चुनाव को जितने के सपने देखने लगे थे। लेकिन आज दूसरे मुद्दों की तरह इस मुद्दे ने भी दम तोड़ दिया क्योंकि कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस पर दायर की गई याचिका को खारिज कर दिया है।

हिजाब के मुद्दे को लेकर दायर याचिका को कोर्ट ने किया खारिज

कर्नाटक हाई कोर्ट ने शिक्षण संस्‍थानों में हिजाब पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दी हैं। हाई कोर्ट ने फैसले में कहा कि हिजाब पहनना इस्‍लाम धर्म की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। कोर्ट के अनुसार, शिक्षण संस्‍थानों का यूनिफॉर्म तय करना एक उचित पाबंदी है जिसपर स्‍टूडेंट्स आपत्ति नहीं कर सकते। अदालत ने यह भी कहा कि 5 फरवरी के सरकारी आदेश को अमान्य करने के लिए कोई केस नहीं बनता है। यहां ये भी जानना बहुत जरूरी है कि इससे पहले तमिलनाडु केरल और महाराष्ट्र कोर्ट ने बी हिजाब के मामले में इसी तरह का फैसला सुनाया था जिससे साफ होता है कि देश का माहौल खराब करने के लिए कुछ लोग सिर्फ इसे एक मुद्दे कि तरह प्रयोग करने की कोशिश करते है वो भी तब जब देश में चुनाव का माहौल हो।

 

हिजाब से हुआ राजनीतिक ध्रुवीकरण

चुनाव के हर चरण के दौरान राजनीतिक बयानबाजी से परे इस मामले में हिजाब  के मुद्दे पर बहस चलती रही। हिजाब एक ऐसा विषय बना, जिससे प्रदेश में मुस्लिम और गैर-मुसलमानों के पहचान को लेकर चर्चा शुरू हुई और हर चरण तक चलती रही। वास्तव में, इस तरह की घटनाओं से बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों समुदायों में असुरक्षा पैदा होती है। ये असुरक्षाएं चुनावों के दौरान राजनीतिक ध्रुवीकरण  के लिए चारे का काम करती है। हालांकि, अल्पसंख्यक समुदाय के लिए, यह डर उनकी मानसिकता को ट्रिगर कर सकता है। उनके इसी डर को भुनाने के लिए और अल्पसंख्यक समुदाय के वोट को अपनी तरफ खींचने के लिए इस मुद्दे को कई पार्टियों ने चुनाव के दौरान उठाया। लेकिन हकीकत ये है कि ये उतना बड़ा मुद्दा नहीं बन पाया। लेकिन सवाल जरूर खड़ा कर गया कि आखिर सिर्फ चुनाव को जीतने के लिये कुछ लोग देश का माहौल क्यो खराब करना चाहते है।

ऐसे देश की कुछ पार्टिया इस तरह के पुराने मुद्दे उठाकर पुरानी सियासत का दांव ही चलना चाहते है लेकिन हकीकत ये है कि अब देश इन सब तरह के मुद्दे को काफी पीछे छोड़ चुका है और वो नई सियासत को अपना रहा है जिसमे जनता राजनैतिक दलों से विकास पर किया काम के बारे में पूछती है जिसका जवाब अभी सिर्फ पीएम मोदी की पार्टी के पास है तभी तो वो ज्यादातर चुनाव में जीत हासिल करती जा रही है।