कठुआ रेप और मर्डर केस में दोषियों को सजा

  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Kathua Rape Case accussed

पठानकोट कोर्ट ने कठुआ में पिछले साल जनवरी में हुई नाबालिग बच्ची के सामूहिक बलात्कार और हत्या के केस में 6 दोषियों को सजा सुनाई| अदालत ने 7 में से 6 को दोषी करार देते हुए, 3 दोषियों (सांझी राम, दीपक खजुरिया और परवेश) को उम्र कैद और 3 (तिलक राज, आनंद दत्ता और सुरेंद्र कुमार) को पाँच-पाँच साल की सजा सुनाई|

Kathua Rape Case accussed

गौरतलब है की पिछले साल हुई इस नृशंस घटना ने पुरे देश को झकझोर कर रख दिया था| 8 साल की मासूम के साथ कई दिनों तक सामूहिक बलात्कार और बाद में निर्मम हत्या जैसी अमानवीय हरकत के बाद एक बार फिर से देश में बलात्कार के खिलाफ सख्त क़ानून बनाने की मांग ने जोर पकड़ी थी| पहले से उपलब्ध कानून के मुताबिक सजा का प्रावधान इस प्रकार था:

• 12 साल तक की बच्ची से बलात्कार की सजा कम से कम सात साल और अधिकतम उम्र कैद
• 13 से 16 साल तक की बच्ची से बलात्कार की सजा कम से कम 10 साल और अधिकतम उम्र कैद
• महिला के साथ बलात्कार की सजा कम से कम 7 साल और अधिकतम उम्र कैद

हालाँकि बलात्कार के केस में इन्साफ के लिए लड़ाई ज्यादा मुश्किल थी| पुलिस, थाना, वकील, और अदालत के चक्करों के साथ-साथ मीडिया की दखलंदाजी से पीड़ितों के लिए न्याय की लड़ाई लड़ना ज्यादा मुश्किल होती थी|

न्यायालयों में लंबित मामले और न्याय मिलने में होने वाली देरी के चलते मुजरिमों को साक्ष्य के साथ खिलवाड़ और सबूतों और गवाहों को बरगलाने का समय मिल जाता था| ऐसे में अनेकों मामलों में अपराधी साफ़ बच कर निकल जाते थे| इसलिए बलात्कार के मामलों में कानून सख्त करने की, सजा को और कठिन बनाने की तथा ऐसे मामलों के त्वरित निपटारे की आवश्यकता थी|

POCSO एक्ट को और सख्त किया मोदी सरकार ने

इस दिशा में सराहनीय प्रयास करते हुए नरेन्द्र मोदी सरकार ने POCSO एक्ट में कुछ जरुरी बदलाव किये| नए कानून के मुताबिक नाबालिग के साथ बलात्कार की न्यूनतम सजा कम से कम 20 साल और अधिकतम उम्र कैद की सजा का प्रावधान किया गया| साथ ही अन्य बलात्कार के केस में भी न्यूनतम सजा कम से कम 10 साल और अधिकतम उम्र कैद की सजा का प्रावधान किया गया|

सुनवाई समाप्त होने की अधिकतम समय सीमा – 2 महीना

सबसे जरुरी बदलाव जो इस नए कानून में किया गया, वो था सुनवाई की अधिकतम समय सीमा को सुनिश्चित करना| बलात्कार के सभी मामलों में सुनवाई की अधिकतम समय सीमा को दो महीने कर दी गयी|

ये एक ऐसा मामला है जिस से राजनीति को दूर रखा जाना चाहिए| नारी अस्मिता और नारी मानवाधिकार जैसे मुद्दे को वोट बैंक की तरह बनाकर उसका उपयोग नहीं होना चाहिए| लेकिन फिर भी सरकार के लिए जनता के लिए अपनी प्रतिबध्धता और नारी अस्मिता जैसे मुद्दों को वादों के जाल में न फँसाकर ठोस कदम उठाना अनिवार्य होना चाहिए|


  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •