ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार के साथ हुआ एक युग का अंत

1957 में कांग्रेस की टिकट पर सिंधिया राजघराने की महारानी विजियाराजे ने गुना लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था और जीती भी थी| तबसे लेकर आज तक उस सीट से सिंधिया परिवार चुनाव लड़ता आया है और जीतता आया है| लेकिन पहली बार सिंधिया परिवार का कोई सदस्य गुना लोकसभा सीट से चुनाव हार गया| मध्यप्रदेश में कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले इस सीट पर 1957 के बाद पहली बार पार्टी को करारी हार मिली है|

पार्टी के दिग्गज नेता और राहुल गाँधी के बचपन के मित्र ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनाव हार गए हैं| उन्हें बीजेपी उम्मीदवार कृष्णपाल सिंह यादव ने सवा लाख से ज्यादा मतों से मात दे दी है| बताते चले की ज्योतिरादित्य सिंधिया ना केवल राहुल गांधी के बचपन के दोस्त हैं, बल्कि वह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बाद युवा शक्तियों में नंबर दो माने जाते हैं| दिसम्बर में संपन्न विधानसभा चुनाव के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया को मध्यप्रदेश का सीएम बनाने की मांग जोरो पर थी, पर उस वक्त उन्हें राहुल गाँधी ने उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बना दिया था|

jyotiraditya sindhiya

वैसे यह ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए दोहरी हार है, क्यूंकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो गया है, जहाँ की कमान उनके कंधो पर थी|

बताते चले की गुना सीट से भाजपा के कृष्णपाल सिंह यादव विजयी रहे है, यादव कभी सिंधिया के संसद प्रतिनिधि रह चुके है| 2019 लोकसभा चुनाव के लिए जैसे ही वो भाजपा का चेहरा बने उनकी चर्चा चारो तरफ होने लगी| उनके भाजपा प्रत्याशी घोषित होते ही सिंधिया की पत्नी ने ट्वीट किया था, “जो कभी महाराज महाराज के साथ सेल्फी लेने को उनका घंटो इंतज़ार करता था, वो आज उन्हें चुनौती देगा?” 2002 से लेकर 2019 तक तक लगातार गुना का यह सीट ज्योतिरादित्य सिंधिया के नाम रहा है, 1957 से लेकर यह पहली बार होगा जब सिंधिया परिवार का कोई व्यक्ति संसद नहीं पहुंचेगा|

इस लोक सभा चुनाव में भारत की जनता ने यह साफ़ कर दिया कि अब जातिवाद और वंशवाद की राजनीति नहीं चलेगी| चलेगी तो बस विकास की राजनीति|