याद रहना चाहिये, पुलिस के जवान भी किसी के भाई, किसे के बेटे, किसी के पति, किसी के हैं पिता हैं  

किसान आंदोलन ने 2 महीने के बीच में जीतना रंग बदला है शायद ही कभी किसी आंदोलन ने बदले होगे। पहले ये आंदोलन कृषि कानून के विरोध में था फिर ये सरकार के विरोध में हुआ धीरे धीरे ये आंदोलन मोदी विरोध में सिमट गया लेकिन 26 जनवरी से ये आंदोलन देश विरोधी हो गया। तभी तो आंदोलनकारियों ने लालाकिले में देश की अत्मा पर वार किया तो अपने भाई पुलिस वालो पर जानलेवा हमले। लेकिन यहां मजे वाली बात ये है कि कुछ डिजाइनर पत्रकार या फिर कुछ बुद्धिजीवियों को पुलिस पर हुए हमले नही बल्कि पुलिस द्वारा अपने बचाव में किया गया बल प्रयोग नागवार लग रहा है। तभी तो वो अभी भी इन उपद्रवियों को भोलाभाला बताने में लगे हुए है।

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आखिर देश के जवानों के जख्म क्यों नहीं दिखते

सोशल मीडिया में आज अगर आप देखे तो वो सारी फोटो मिल जायेगी जिसमे किसान के नाम पर कुछ उपद्रवियों ने पुलिस के जवानो पर कैसे हमला किया। किसी पुलिस वाले ने बुजुर्ग समझकर धरने से जाने की विनती की तो उसपर तलवार से वार कर दिया तो लालकिले पर किस तरह से पुलिस वालो को निशाना बनाया गया। सब दिख जायेगा लेकिन इसके बावजूद कुछ लोग आरोप लगा रहे है कि पुलिस इन लोगो पर लाठी भाँज रही है तो गलत व्यवहार कर रही है जबकि आप साफ देख रहे है कि कैसे तलवारों से पुलिस वालो के हाथ कांटे जा रहे है लेकिन मजे की बात तो यही है कुछ लोगों को ये नही दिख रहा है। जबकि दिल्ली पुलिस को सैल्यूट करना चाहिये क्योंकि इतने बड़े हंगामे के बाद भी एक जगह से गोली चलने की खबर नही आई और इसका कारण ये रहा कि पुलिस ने इन लोगों को भी अपना भाई ही समझा लेकिन उपद्रवियों ने इन्हे देश का जवान नही समझा।

किसान आंदोलन नही बल्कि विपक्ष का प्रदर्शन

पहले किसान आंदोलन के मंच से बड़े बड़े स्वर में बोला जा रहा था कि ये आंदोलन किसी भी विपक्ष की पार्टी शामिल नही है। लेकिन धीरे धीरे जब आंदोलन से पर्दा उठाने लगा तो पता चला कि ये आंदोलन तो देश की सभी विरोधी पार्टियों द्वारा ही सत्ता के खिलाफ रचा गया एक मंच है। शायद इसी लिये सरकार के कानून को 2 साल के लिए स्थगित करने के बाद भी आंदोलन जारी रखा गया। मतलब साफ है कि आंदोलन में बैठे कठपुतली को चलाने वाले कोई और है जिसका पर्दा गाजीपुर में खुलने लगा है। जो ये बता रहा है कि सत्ता के लिये कुछ लोग कितना गिर सकते है कि वो उन लोगो के पास जाकर तो जरूर बैठ रहे है जिन्होने देश की आत्मा और देश के जवानो को जख्मी किया है लेकिन उन लोगों से मिलने तक नही पहुंचे जिन्होने शरीर पर चोट खाकर भी संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की।

ऐसे में हम अब आपको खुद फैसला करना होगा कि कौन देश के साथ खड़ा है और कौन देश के विरोध में और हां आने वाले लोकतंत्र के पर्व यानी चुनाव के वक्त इस बात को याद रखकर अपना मत देकर देश तोड़ने वालो को करार जवाब देने के लिये तैयार रहियेगा।