OPINION: मोदी के भारत को हांक लेना आसान नहीं

  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

PM-Narendra-Modi

‘नेशन फ़र्स्ट’, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) के लिए यह महज़ अपनी पार्टी का घोषवाक्य ही नहीं बल्कि उनकी एनडीए सरकार के निर्णयों का मूलमंत्र भी है. यह बात एक बार फिर तब साबित हो गयी जब प्रधानमंत्री ने बैंकॉक में रीजनल कॉम्प्रेहेन्सिव इकनॉमिक पार्टनरशिप (RCEP) समझौते पर भारत की सहमति देने से स्पष्ट इनकार कर दिया है. मोदी सरकार के पहले पांच साल के कार्यकाल तथा दूसरे कार्यकाल के छह महीनों में लिए गए घरेलू और विदेशनीति संबंधी फ़ैसलों से और अमेरिका, चीन जैसी दुनिया की बड़ी ताक़तों से बराबरी से बात करने के प्रधानमंत्री के रवैये से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह कोई छुपी हुई बात नहीं रह गई है कि मोदी के नेतृत्व में आज एक सशक्त भारत से दुनिया का सामना है. उस पहले वाले भारत से नहीं जिसे बड़ी ताक़तें अक्सर अपने हितों के हिसाब से हांक लेने में सफल हो जाती थीं. ख़ासतौर से व्यापार-वाणिज्य के मामले में. प्रधानमंत्री मोदी ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का शानदार ढंग से निबाह करते हुए दुनिया को जता दिया कि उनकी अगुआई में खड़ा भारत अपने हितों पर ज़रा भी आंच नहीं आने देगा. RCEP देशों ने एक बार फिर इसे महसूस किया होगा.

भारत को इन-इन मोर्चों पर मिली फतह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृढ़निश्चयी स्वभाव से अब तक अच्छे ख़ासे परिचित हो चुके 10 आसियान देशों और भारत समेत उनके सबसे बड़े व्यापार सहयोगी देशों- चीन, जापान, कोरिया, न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया समेत 16 देशों के इस समूह—जिसे रीजनल कॉम्प्रेहेन्सिव इकनॉमिक पार्टनरशिप कहा जाता है, के लिए भारत का स्पष्ट नकार शायद एक असंभावित लेकिन ज़रूरी झटका है. लेकिन इससे भारत के किसानों, डेयरीवालों, छोटे उद्यम, कारख़ाने चलाने वालों, प्रोफेशनलों, सर्विस सेक्टर चलानेवालों, मज़दूरों तथा उपभोक्ताओं के भी हित सुरक्षित हो गए हैं. सबसे बड़ी बात है कि भारत के ये सेक्टर सस्ते चीनी सामान की आशंकित मार से भी बच गए हैं. डेरी उद्योग भी ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूज़ीलैंड के डेयरी उत्पादों के हमले से सुरक्षित हो गया है. भारत के इस पर हस्ताक्षर करने की सूरत में हमें इन देशों से आयात होने वाले सामान पर आयात शुल्क में 90 फ़ीसदी तक कटौती करनी पड़ती, हमारे बाज़ार विशेषकर सस्ते चीनी सामान पट जाते और चीन समेत और 11 RCEP देशों के साथ व्यापार में बढ़ता असंतुलन और अधिक बढ़ जाता है.

मोदी भारतीय हितों के मामले में कड़ी सौदेबाज़ी करने वाले नेता माने जाते हैें

मोदी को अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में भारत के हितों के मामले में कड़ी सौदेबाज़ी करने वाले नेता के बतौर जाना जाता है और यह कोई पहला अवसर नहीं कि भारत ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और उससे संबंधित वार्ताओं में दृढ़निश्चय दिखाया है. वैसे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने देश के हितों के लिए विश्व के दूसरे देशों के साथ सख्त सौदेबाज़ी करने वाले नेता के रूप में मशहूर हैं, लेकिन स्वयं उन्होंने ही मोदी को एक ‘टफ नेगोशिएटर’ करार दिया है. मोदी की अमेरिका यात्राओं के दौरान दोनों देशों के परस्पर संबंधों की वार्ताओं में ट्रम्प को यह अनुभव आया होगा.

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने देश के हितों के लिए विश्व के दूसरे देशों के साथ सख्त सौदेबाज़ी करने वाले नेता के रूप में मशहूर हैं, लेकिन स्वयं उन्होंने ही मोदी को एक 'टफ नेगोशिएटर' करार दिया है.

ट्रंप के पूर्ववर्ती बराक ओबामा के सहायक रहे बेन रोड्स का भी अनुभव है कि जलवायु परिवर्तन पर पेरिस में हुए शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की सहमति तब तक नहीं जताई जब तक यह भरोसा नहीं हो गया कि समझौते से भारत के हितों पर कोई आंच नहीं आएगी और विकसित देशों की पांत में खड़े होने को तैयार भारत को कार्बन उत्सर्जन के नाम पर ढांचागत विकास से निरर्थक रोकने की चेष्टा नहीं की जाएगी. रोड्स का अनुभव है कि मोदी को राज़ी करने में ओबामा को तब ख़ासी मुश्किल हुई थी.

मोदी निर्णय लेते समय समाज के सबसे गरीब व्यक्ति के बारे में विचार करते हैं

इंडोनेशिया, थाईलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, फ़िलिपींस, वियतनाम, म्यांमार, कंबोडिया, लाओस और ब्रूनेई इन ASEAN देशों के साथ पिछले कुछ वर्षों में भारत का व्यापार बढ़ा है और ये देश भी इस उम्मीद में हैं कि भारत के RCEP समझौते पर हस्ताक्षर करने से उन्हे बड़ा बाज़ार मिल जाएगा. ये देश भारत के साथ कारोबार बढ़ाने में ख़ासी दिलचस्पी ले रहे थे, लेकिन नए भारत के प्रधानमंत्री मोदी के लिए अपने देश के हित सर्वप्रथम थे, इसलिए उन्होंने साफ़ ऐलान किया कि ”RCEP का वर्तमान मसौदा इसकी मूल भावना और सबकी सहमति से बने इसके मार्गदर्शक सिद्धांतों को पूरी तरह प्रकट नहीं करता और ना ही यह (बदले हुए आर्थिक तथा व्यापार परिदृश्य में) भारत के लम्बित मुद्दों तथा चिंताओं की पूरी तरह परवाह ही करता है. इस परिस्थिति में भारत के लिए RCEP समझौते में शामिल होना सम्भव नहीं है. ऐस निर्णयों में हमारे किसानों, व्यापारियों, प्रोफेशनलों और उद्योगों के हित जुड़े हैं. इतने ही महत्वपूर्ण हैं हमारे मज़दूर और उपभोक्ता जो भारत एक बड़ा बाज़ार और बड़ी अर्थव्यवस्था बनाते हैं. जब मैं RCEP को सभी भारतीयों के हितों के नज़रिए से देखता हूं तो मुझे कोई सकारात्मक उत्तर नहीं मिलता इसलिए न तो गांधी जी के सिद्धांत और न ही मेरी अंतरात्मा मुझे RCEP में शामिल होने की अनुमति देती है.” मोदी ने कहा कि ऐसे निर्णय करते समय हमें समाज के सबसे गरीब व्यक्ति का विचार करना चाहिए. प्रधानमंत्री इन देशों को वह इतिहास याद दिलाना नहीं भूले जब “RCEP के बनने से हज़ारों बरस पहले भारत के व्यापारियों, उद्यमियों और सामान्य लोगों ने इस क्षेत्र से अटूट रिश्ते बनाए थे, और इन सम्बन्धों ने हमारी साझा समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है.”

मोदी के नेतृत्व में भारत की बढ़ी इच्छाशक्ति

मोदी की अगुआई में उभरते भारत ने यह रुख़ ऐसे समय अपनाया है जब अमेरिका-चीन के व्यापार युद्ध के कारण विश्व व्यापार में आपाधापी मची है. ऐसे में 16 देशों की यह साझेदारी विश्व में सबसे बड़े व्यापार समूह के रूप में उभर सकती है. आसियान देश और उनके व्यापार साझीदार (भारत समेत) चीन, जापान जैसे देशों को मिलकर बनी इस पार्टनरशिप वाले भौगोलिक क्षेत्र में विश्व की लगभग आधी आबादी बसती है. विश्व के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इसका योगदान 25 % है. विश्व का लगभग एक तिहाई व्यापार इस क्षेत्र में होता है. ऐसे समूह में शामिल ना होने का बड़ा निर्णय अपने राष्ट्र के हितों को उससे भी ऊपर रखने की मजबूत इच्छाशक्ति के बग़ैर नहीं लिया जा सकता. मोदी के नेतृत्व में भारत ने वह इच्छाशक्ति दिखाई है.

भारत ही है जो RCEP का उद्धारक बन सकता

भारत के इनकार के बाद बाक़ी 15 देशों ने तय किया है कि वे अगले वर्ष इस करार को अंतिम रूप देने की मंशा रखते हैं. चीन को अमेरिका से व्यापार तनातनी के कारण अपने यहां जमा हो रहे उत्पादों को खपाने की चिंता है लेकिन RCEP के ज़्यादातर देशों को लगता है कि भारत इसमें रहे तो यह साझेदारी और बड़ी, व्यापक और बेहतर होगी. ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने ठीक ही कहा कि इस बारे में धीरज रखना ही उचित है, लेकिन इतना तय है कि भारत की चिंताओं को सुलझाए बग़ैर यह करार परिपूर्ण नहीं होगा. भारत के बिना बाक़ी 15 देशों ने इस पर हस्ताक्षर कर दिए तो वह समूह चीनी आधिपत्य वाला समूह बनकर रह जाएगा जिसके पास ना तो अच्छी ख़रीद क्षमता वाला बड़ा बाज़ार होगा ना ही बहुविध प्रतिभा वाले कर्मचारी-कारीगर. भारत का हाथ इसलिए ऊपर है क्योंकि ये दोनों बातें उसके पास है और सबसे बड़ी बात कि मोदी जैसा सक्षम नेतृत्व जिनकी अगुआई में पिछले पांच-छह वर्षों में भारत ने अपनी ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी के तहत जापान से लेकर तमाम दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ अलग से परस्पर हितों के रिश्ते बनाए हैं. ऐसे में भारत ही है जो RCEP का उद्धारक बन सकता है.

(यह पोस्ट IndiaFirst द्वारा नहीं लिखा गया है, मूल पोस्ट https://hindi.news18.com/ पर प्रकाशित हुआ था)


  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •