ईरान ने अमेरिका से शांतिवार्ता के लिए किसी मुस्लिम देश को नहीं बल्कि भारत को बनाया शांति दूत

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के भविष्य में कम होने की संभावना बनती दिखाई दे रही है। इसके पीछे भारत में मौजूद ईरानी राजदूत का वो बयान है जिसमें उन्होंने कहा है कि तनाव कम करने के लिए भारत द्वारा की गई कोशिशों का ईरान स्वागत करेगा। वहीं अब अमेरिका की तरफ से भी इसी तरह की बात कही गई है। इन दोनों ने ही भारत को केंद्र में रखते हुए यह बयान दिए हैं। इसका अर्थ साफतौर पर यही है कि मध्य पूर्व समेत पूरी दुनिया में जारी तनाव को कम करने में भारत अहम भूमिका निभा सकता है। कुछ समय पहले विदेश मामलों के जानकार कमर आगा ने भी यही बात कही थी। उनका कहना था कि क्योंकि भारत ईरान और अमेरिका का करीबी सहयोगी है इसलिए वह इस क्षेत्र में शांति के लिए अहम भूमिका अदा कर सकता है।

कुछ धर्म के ठेकेदारा द्वारा डर का माहौल पैदा करने की कोशिश

दुनिया में 56 मुस्लिम देश होने के वावजूद ईरान का अमेरिका से शांतिवार्ता के लिए किसी मुस्लिम देश को न चुनकर भारत को चुनना भारत की बढती ताकत को साबित करता है। साथ ही बताता है कि यहाँ धर्म के नाम पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता है और देश के मुस्लिम उतने ही सुरक्षित है जितने किसी दुसरे मुस्लिम देश में। फिर भी कुछ धर्म के ठेकदार लोग भारत की सौहार्दपूर्ण माहौल को खराब करना चाहते है और भारत में अल्पसंख्यकों के मन में डर पैदा करने की कोशिश करते रहते है।

ऐसा नहीं है कि CAA और NRC के बारे में धर्म विशेष के लोग अभी ठीक से समझ नहीं पाए हैं बल्कि सच्चाई यह है कि सब कुछ सही-सही समझ लिया गया है, न समझने का सिर्फ नाटक किया जा रहा है। यह भली-भांति समझ लिया गया है कि इन दोनों कानूनों और प्रक्रियाओं से भारत के इस्लामिकों सहित किसी भी धर्म के किसी भी नागरिक की नागरिकता नहीं छीनी जाने वाली। लेकिन कुछ धर्म के ठेकेदारा का एजेंडा स्पष्ट है-

1. CAA के तहत घुसपैठियों को भी नागरिकता दो।
2. NRC के तहत एक भी घुसपैठिया निकाला नहीं जाना चाहिए।

दोनों देशों में तनाव की वजह

आपको यहां पर बता दें कि टॉप ईरानी कमांडर और देश के दूसरे सबसे बड़े नेता कासिम सुलेमानी की अमेरिकी ड्रोन हमले में मौत के बाद, दोनों देशों के बीच कडवाहट काफी बढ़ गयी थी। कई अमेरिकी सांसदों ने भी ट्रंप के इस फैसले की कड़ी आलोचना की थी। सांसद और स्पीकर नैंसी पेलोसी भी इन सांसदों में शामिल थीं। इन सांसदों का कहना था कि राष्ट्रपति ट्रंप ने ये फैसला लेकर अमेरिका और अमेरिकियों की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। ये सांसद इसलिए भी खफा थे क्योंकि इस फैसले से पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने सदन को किसी भी तरह से विश्वास में नहीं लिया था। कासिम सुलेमानी की मौत के बाद, अमेरिका में भी ट्रंप की ईरान में कार्रवाई के खिलाफ कई जगह जबरदस्त प्रदर्शन हो रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि ट्रंप अपनी जनता की मंशा के खिलाफ जाने की कोशिश नहीं करेंगे। क्योंकी अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव इसी वर्ष होने हैं।

हालांकि इन सभी के बीच ईरान ने ये कहा था कि ईरान युद्ध नहीं चाहता है। गौरतलब है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। कासिम की मौत का असर दुनियाभर के शेयर बाजारों से लेकर कच्चेे तेल के भाव पर देखने को मिला था।