गुलाम कश्मीर पर पाकिस्तानी कब्जे का शेख अब्दुल्ला ने उठाया था सबसे अधिक फायदा!

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जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के साथ ही एक देश-एक विधान का वह सपना साकार हुआ जो लंबे अर्से से देखा जा रहा था, लेकिन यह सपना सही तरह से तब पूरा होगा जब गुलाम कश्मीर भी भारत-भूमि का हिस्सा बनेगा। बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कहकर प्रत्येक भारतीय के मन की व्यथा को कुरेदा कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की कसक उनके मन में है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह बात राजौरी में सैनिकों के साथ दीपावली मनाते समय कही। राजौरी के उत्तर में ही पुंछ है। 1947 में हमारी सेनाओं ने पुंछ कस्बे को तो आजाद करा लिया, लेकिन युद्धविराम की जल्दी में पूरे जिले को मुक्त नहीं कराया जा सका। उत्तर दिशा में हाजीपीर दर्रे से होकर जाने वाली सड़क पुंछ को उड़ी से जोड़ती है। पुंछ से उड़ी जाने का जो रास्ता 30 किमी लंबा हुआ करता था वह अब कहीं अधिक लंबा हो गया है। इसका कारण यह है कि हाजीपीर दर्रे के साथ यह रास्ता पाकिस्तान के कब्जे में जा चुका है। 1947 में यह रास्ता हमारे नियंत्रण में था।

दरअसल 161 इन्फैंट्री बिग्रेड की मोर्चेबंदी में अनायास ही ऐसे परिवर्तन किए गए जिनका लाभ उठाकर पाकिस्तानी सेना हाजीपीर दर्जे पर काबिज हो गई थी। यह तत्कालीन ब्रिगेडियर एंडरसन के नाकारापन का परिणाम था जो आगे चलकर लेफ्टिनेंट जनरल बने। इसके कारण एक तो कश्मीर की रक्षा व्यवस्था और नाजुक हो गई और दूसरे, पश्चिमी कश्मीर के पंजाबी, गोजरी भाषी इलाके भी दो भागों में विभाजित हो गए। कुपवाड़ा, उड़ी एक तरफ और राजौरी, पुंछ दूसरी तरफ रह गए। इससे उनकी राजनीतिक शक्ति बनने की संभावनाएं क्षीण पड़ गईं।

नेहरू और माउंटबेटन ने दिलचस्पी क्यों नहीं दिखाई?

हमारे तत्कालीन शासकों ने भागते हुए कबायलियों का पीछा कर रही भारतीय सेना को उड़ी में ही रोक दिया जबकि मुजफ्फराबाद का रास्ता पूरी तरह खुला हुआ था। उड़ी के दक्षिण में सैन्य अभियान चलाकर पाकिस्तानी घेरे को उत्तर की दिशा से तोड़कर पुंछ तक जोड़ा जा सकता था, लेकिन कोई नहीं जानता कि नेहरू और माउंटबेटन ने इसमें दिलचस्पी क्यों नहीं दिखाई? जो इलाके अभी गुलाम कश्मीर का हिस्सा हैं उन्हें हमारे तत्कालीन नेतृत्व ने एक तरह से पाकिस्तान को तश्तरी में रखकर परोस दिया। इसके पीछे दो उद्देश्य दिखते हैं। भारत विभाजन के बाद के हालात में गुलाम कश्मीर के दस जिलों के अलावा उत्तर में स्थित गिलगित-बाल्टिस्तान अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो गया था।

यह इलाका चीन-पाकिस्तान-रूस-अफगानिस्तान की सीमाओं से लगा ऐसा क्षेत्र था जिसकी पहाड़ियों से रूस-चीन की गतिविधियों पर निगाह रखी जा सकती थी। भारत की आदर्शवादी नीतियों के चलते इस क्षेत्र का ब्रिटिश-अमेरिकी हितों के लिए उपयोग हो पाना संभव नहीं था। भारतीय ब्रिटिश सेना के तत्कालीन प्रमुख जनरल लॉकहर्ट और गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन का दायित्व ब्रिटेन के हितों की रक्षा करना भी था। गिलगित एजेंसी ब्रिटिश नियंत्रण में थी। अंग्रेज सरकार उसे आजादी के वक्त भारत को दे सकती थी, लेकिन उसने वह क्षेत्र 30 जुलाई, 1947 को कश्मीर के महाराजा को हस्तगत कर दिया।

ब्रिटिश षड्यंत्र की ओर स्पष्ट इशारा

महाराजा की सेना के ब्रिटिश मेजर ब्राउन ने एक नवंबर, 1947 को महाराजा के मुस्लिम सैनिकों से विद्रोह कराकर गिलगित पाकिस्तान को सौंप दिया। लेह-लद्दाख तो भारतीय सेनाओं ने अपनी जीवटता से अपने कब्जे में ले लिया, लेकिन बाल्टिस्तान में हमारी सेनाओं को कोई सहयोग नही मिल सका। कर्नल शेर सिंह थापा सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ महीनों तक स्कर्दू का मोर्चा संभाले रहे। मजबूरी में उन्हें पीछे हटना पड़ा। गिलगित-बाल्टिस्तान के लिए कोई अभियान न चलाया जाना ब्रिटिश षड्यंत्र की ओर स्पष्ट इशारा करता है।

शेख साहब की राजनीति का सूरज सदा के लिए अस्त हो जाता

यह भी नजर आता है कि शेख अब्दुल्ला की स्थानीय राजनीति को निष्कंटक बनाने के लिए गुलाम कश्मीर को अस्तित्व में आने दिया गया। गुलाम कश्मीर के इलाके और खासकर नीलम वैली, मुजफ्फराबाद, कोटली, मीरपुर, भिंबर आदि कश्मीरी नहीं, बल्कि पंजाबी, पहाड़ी और गोजरी भाषी हैं। इन इलाकों पर कश्मीरी नेता शेख अब्दुल्ला का जादू नहीं चला, क्योंकि वे अपनी सांस्कृतिक-भाषाई पहचान की दृष्टि से जम्मू के डोगरा-पंजाबी र्हिंदू राजपूत बिरादरी के ज्यादा निकट थे। यदि संपूर्ण कश्मीर मुक्त करा लिया गया होता तो पंजाबी, पहाड़ी और डोगरा समाज का समीकरण आबादी का सबसे बड़ा वर्ग होने के चलते सत्ता का स्वाभाविक दावेदार हो सकता था। ऐसा होता तो शेख साहब की राजनीति का सूरज सदा के लिए अस्त हो जाता।

शेख की सत्ता के लिए कश्मीर का बंटवारा जरूरी था

गुलाम कश्मीर की 45 लाख की आबादी, जम्मू क्षेत्र की 45 लाख की आबादी के साथ मिलकर करीब 90 लाख हो जाती। यदि इनमें भारतीय पश्चिमी कश्मीर के राजौरी, पुंछ और कुपवाड़ा जिले के अलावा उड़ी और बुनियार तहसीलें भी मिला लें तो कुल आबादी एक करोड़ से अधिक हो जाती जो कश्मीर घाटी की 60-70 लाख जनसंख्या से कहीं अधिक होती। चूंकि शेख की सत्ता के लिए कश्मीर का बंटवारा जरूरी था इसलिए हमारे नेतृत्व ने सैन्य अभियान पर उड़ी में ही विराम लगा दिया और इस तरह गुलाम कश्मीर को पाकिस्तान के हाथ में बने रहने दिया गया।

‘युद्धविराम तो भारत और कश्मीर के प्रधानमंत्रियों ने लागू कराया था ’

अपनी पुस्तक ‘द ब्लंडर्स एंड वे आउट’ में कश्मीरी नेता भीम सिंह ने लंदन में माउंटबेटन से 1970 में हुई अपनी मुलाकात का जिक्र किया है। उन्होंने माउंटबेटन से पूछा था कि जब सेनाएं जीत रही थीं तब आपने एकतरफा युद्धविराम क्यों स्वीकार कर लिया? इस पर माउंटबेटन का जवाब था, ‘युद्धविराम तो भारत और कश्मीर के प्रधानमंत्रियों ने लागू कराया था। ’ गुलाम कश्मीर के पाकिस्तान के कब्जे में जाते ही शेख अब्दुल्ला का कश्मीर में एकछत्र राज कायम हो गया। हाजीपीर दर्रे और उड़ी-पुंछ मार्ग पर पाकिस्तान का कब्जा हो जाना शेख अब्दुल्ला की राजनीति के लिए फायदेमंद रहा।

हालांकि 1965 के युद्ध के दौरान भारतीय सेनाओं ने पहले ही हमले में हाजीपीर दर्रे को कब्जे में लेकर पाकिस्तान के कब्जे वाले मार्ग को खोल दिया था, लेकिन उसकी वापसी ताशकंद वार्ता का एक बड़ा मुद्दा बनी। फिर हमें उसे वापस करने के लिए बाध्य होना पड़ा। कुछ इसी तरह की गलती 1971 के युद्ध के बाद की गई थी। समझना कठिन है कि इस युद्ध के दौरान गुलाम कश्मीर की वापसी सुनिश्चित क्यों नहीं की गई? उड़ी की सीमावर्ती चौकियों से हाजीपीर दर्रा साफ दिखाई देता है। अपने सैन्य जीवन के दौरान मैं इन चौकियों पर चहलकदमी कर चुका हूं। हम हाजीपीर दर्रे तक पहुंचने के लिए हमेशा बेचैन रहते थे। यह अच्छा है कि अब यही बेचैनी हमारे शीर्ष नेतृत्व में भी दिख रही है। गुलाम कश्मीर की वापसी दिवास्वप्न नहीं रहनी चाहिए।

(यह पोस्ट IndiaFirst द्वारा नहीं लिखा गया है, मूल पोस्ट https://www.jagran.com पर प्रकाशित हुआ था| जागरण ही पोस्ट और तस्वीरों के लिए अधिकृत है)


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