इंफ्रास्ट्रक्चर जिनके लिए राजनीति का नहीं बल्कि राष्ट्रनीति का हिस्सा होता है वो अटके नहीं, लटके नहीं, भटके नहीं!

राजनीतिक दांवपेंच ने देश के सबसे बड़े एयरपोर्ट का इंतजार भी लंबा कर दिया था। साल 2001 में राजनाथ सरकार ने इस योजना का प्रस्ताव केंद्र के पास भेजा था जिसे अट्ल सरकार ने पास कर दिया था। हालांकि सत्ता बदलने के बाद ये योजना सिर्फ नेताओं के वादों में ही दिखी। आइये जानते है इतनी अटकने भटकने के बाद ये योजना आज जमीनी हकीकत बन पाई है तो कितना झेलना पड़ा है

सियासत में फंसी परियोजना

साल 2001 में जेवर में एक इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाने का सपना देखा था जिसपर केंद्र की हरी झंडी भी दिखा दी गई थी लेकिन इसके बाद जैसे ही इन दोनो की सरकार सत्ता से गई बस इस योजना को सियासी ग्रह लग गया। किसी ने अपने फायदे के लिये इसका स्थान बदलने का दांव चला लेकिन साल 2004 में केंद्र में मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए सरकार में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों ही हिस्सेदार थे। उस वक्त मायावती जेवर में एयरपोर्ट बनवाना चाहती थीं, लेकिन मुलायम सिंह यादव आगरा के आसपास एयरपोर्ट को शिफ्ट करवाना चाहते थे। तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने जेवर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट को लेकर सांप और छछूंदर जैसी स्थिति बनी रही क्योंकि अगर वे मायावती को खुश रखने के लिए जेवर में एयरपोर्ट बनाते तो मुलायम सिंह यादव रूठ जाते और अगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को आगरा में शिफ्ट कर देते तो मायावती चंडी रूप देखने को मिलता। लिहाजा, मनमोहन सरकार ने 10 साल तक जेवर का पेंच फंसाये ही रखा। इसके साथ साथ  जब दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा जीएमआर समूह को सौंपा गया,था तब केंद्र सरकार के साथ हुए समझौते में ये शर्त रखी गई थी कि इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से 150 किलोमीटर के दायरे में नया इंटरनेशनल एयरपोर्ट नहीं बनाया जाएगा। बता दें कि दिल्ली और जेवर में बनने वाले एयरपोर्ट के बीच की दूरी 72 किलोमीटर है लेकिन सत्ता की मजबूरी के चलते ये योजना अटकी रही।

2014 के बाद योजना को फिर से लगा पंख

साल 2014 में एक बार फिर जब केंद्र में सत्ता बदली तो इस योजना को लेकर फिर से परवान चढ़ा।  हालांकि राज्य सरकार ने इस योजना को साल 2016 में सैफई में ले जाने का प्रस्ताव रखा जिसे नहीं माना गया और योजना फिर से अटक गई। पर जैसे ही यूपी और केंद्र दोनो में एक ही दल की सरकार आई तो इस योजना पर तेज गति से काम किया गया जिसके तहत किसानों की जमीन को अच्छे मुआवजे के साथ खरीदा गया, जिसके बाद कागज से जमीन पर ये योजना उतर पाई और पीएम मोदी ने इस योजना का शिलान्यास किया। यहां ये बताता भी जरूरी है कि ये देश का ही नहीं बल्कि एशिया का सबसे बड़े इंटरनेशनल एयरपोर्ट है और इसके बन जाने के बाद यहां करीब 1 लाख लोगों को रोजगार मिलने की संभावना भी लगाई जा रही है। हर साल इससे करीब 1.2 करोड़ लोग सफर कर सकेंगे। भारतीय संस्कृति की छाप इस एयरपोर्ट में आपको खूब देखने को मिलेगी, तभी तो बनारास के घाट और हरिद्वार के घाट की झलक दिखेगी। वही एयरपोर्ट की छत गंगा की लहरों की तरह दिखाई देगी, 8 रने वे वाले इस एयरपोर्ट में सभी हाईटेक सुविधा होगी।

इस योजनी की शुरूआत से ये साबित साफ होता है कि अगर देशहित के लिये काम किया जाये तो स्थिति कैसी भी हो काम जरूर होता है और पिछले 7 सालों से ऐसा देखा भी जा रहा है।

 

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