ब्रिटेन संसद को उनकी भाषा में भारत का करारा जवाब

ये नया भारत है जो अब उसी भाषा में जवाब देता है जो भाषा सामने वाले को समझ आये। ऐसा हम इसलिये कह रहे है क्योकि चीन हो या पाकिस्तान भारत उन्हे उनकी भाषा में जवाब देता है तो अब ब्रिटेन को भी भारत उनकी भाषा में जवाब दिया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ब्रिटेन में रश्मि सामंत के साथ नस्‍लीय भेदभाव के आरोपों पर प्रतिक्रिया दी है। जिस तरह यूके की संसद ने भारत में जारी किसान आंदोलन पर चर्चा की थी, कुछ उसी तरह भारतीय संसद में रश्मि का मुद्दा गूंजा। विदेश मंत्री ने सोमवार को राज्‍य सभा में कहा कि भारत सरकार सभी डिवेलपमेंट्स पर नजर बनाए हुए है। उन्‍होंने कहा कि जब जरूरत होगी तो भारत इसे मुद्दे को मजबूती से उठाएगा।

Rashmi Samant-S-Jaishankar

सामंत की पुरानी पोस्‍ट्स पर हुआ था विवाद, देना पड़ा इस्‍तीफा

रश्मि सामंत अध्यक्ष पद के लिए डाले गए 3,708 मतों में से 1,966 वोट मिले थे। उनके चुनाव जीतने के बाद 2017 की कुछ पुरानी सोशल मीडिया पोस्‍ट्स को ‘नस्‍लभेदी’, ‘साम्‍य विरोधी’ और ‘ट्रांसफोबिक’ बताया गया। इसमें 2017 में जर्मनी में बर्लिन होलोकास्ट मेमोरियल की यात्रा के दौरान एक पोस्ट में नरसंहार से जुड़ी टिप्पणी और मलेशिया की यात्रा के दौरान तस्वीर को चिंग चांग शीर्षक देने से जुड़ा विवाद है, जिससे चीन के छात्र नाराज हो गए।इसके बाद ऑक्‍सफर्ड कैम्‍पेन फॉर रेशियल अवेयरनेस एंड इक्‍वलिटी और ऑक्‍सफर्ड कैम्‍पेन ने उनके इस्‍तीफे की मांग कर दी। सामंत ने एक खुले पत्र में माफी भी मांगी लेकिन जब विवाद नहीं थमा तो उन्‍होंने इस्‍तीफा देने का फैसला किया। वह भारत लौट आई हैं और पुराने पोस्‍ट्स भी हटा दिए।भारत लौटने के बाद सामंत ने एक इंटरव्‍यू में कहा, “अगर मैं एक खास तरह की दिखती होती तो मुझे पूरा यकीन है कि मुझे संदेह का लाभ मिलता… मेरे मामले में वे फौरन नतीजों पर पहुंच गए। नस्‍लवाद अब खुले तौर पर नहीं छिपे व्‍यवहार के जरिए होता है।

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भारत ने बयान देकर यूके को दिया संदेश

दिल्‍ली की सीमाओं पर किसान प्रदर्शन कर रहे हैं। इसे लेकर ब्रिटेन की संसद में चर्चा हुई। इस दौरान कंजर्वेटिव पार्टी की थेरेसा विलियर्स ने साफ कहा कि कृषि भारत का आंतरिक मामला है और उसे लेकर किसी विदेशी संसद में चर्चा नहीं की जा सकती। हालांकि लेबर पार्टी के सांसद तनमनजीत सिंह धेसी के नेतृत्व में 36 ब्रिटिश सांसदों ने किसान आंदोलन के समर्थन में चिट्ठी लिखकर भारत पर दबाव बनाने की बात कही थी। अब भारतीय संसद में एक यूनिवर्सिटी के विवाद पर प्रतिक्रिया दिए जाने को यूके के लिए एक संदेश की तरह देखा जा रहा है। नस्‍लवाद को किसी भी देश का आंतरिक मसला नहीं कहा जा सकता।

यानी भारत ने साफ कर दिया है कि अगर उसके आतंरिक मामलो में कोई दूसरा हस्तक्षेप करता है तो अब वो चुप नही बैठने वाला बल्कि उसी की तरह उसे करारा जवाब देने वाला देश बन गया है।  मतलब भारत अब चुपचाप रहकर सुनने वालो में से नहीं बल्कि जोरदार जवाब देने वाला दश है