भारत कहीं खो गया था, उसे ऐसे लौटा लाए मोदी

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हाल तक ऐसा दौर रहा, जब भारत के राजनीतिक और प्रशासनिक वर्ग को गंभीरता से नहीं लिया जाता था। साथ ही वे देश की सभ्यता, विरासत और सांस्कृतिक जड़ों से भी अलग-थलग रहा करते। आधिकारिक बैठक सत्ता के गलियारों तक सीमित रहती और खानपान महंगे होटलों की रसोई के स्टैंडर्ड मेन्यू तक सिमटा होता।

भारत ने ख़ुद ही अपने दरवाजे बंद कर लिए थे, जो बदलाव के लिए न तो क़दम उठाता और न ही पहचान बनाता था। भारत जैसे विविध भाषाओं, खानपान संस्कृति, वेशभूषा और धर्मों वाले देश में आधुनिक और राजनीतिक रूप से सही दिखने के लिए सामान्य सभ्यता के सूत्रों से किनारा कर लिया गया। अपनी पहचान के बारे में आत्म निंदा और क्षमा याचना से भरी बातों के चलते देश का वास्तविक चेहरा ही छिप गया था। एक ऐसा माहौल था, जहां बहुसंख्यक लोगों को छोटा माना जाता। अनंत पाप के लिए पश्चाताप करना मानक बन गया वरना उन्हें सांप्रदायिक’ करार दे दिया जाता था।

इसने देश के अभिजात्य वर्ग को अत्यधिक प्रभावित किया। यह वर्ग भारत की इच्छाओं से पूरी तरह विमुख हो गया। ऐसी ताकतें जो आपके गौरव और पहचान के प्रतीकों को तोड़-मरोड़कर पेश कर रही हैं, क्या उनसे ख़ुद को अलग करना उचित नहीं होगा?

नरेंद्र मोदी की सांस्कृतिक पहचान की शांत, लेकिन दृढ़ अभिव्यक्ति ने यह आईना दिखाया है। भारत के हृदय से एक ऐसा नेता उभरा है, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों को लेकर बहुत स्पष्ट है और उसे खुले तौर पर प्रदर्शित करता है। यहां हम एक ऐसा नेता देखते हैं, जो पारंपरिक भारतीय पोशाक में दिखाई देने में संकोच नहीं करता। चाहे भारत में हो या विदेश में। यह नेता तमिलनाडु के परिधान वेष्ठी (धोती) को पहनने में उतना ही सहज है, जितना पूर्वोत्तर की एक टोपी पहनने में।
नरेंद्र मोदी ने बार-बार भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति के प्रति अपना समर्थन दिखाया है। फिर चाहे वह नृत्य, कला, संगीत, पोशाक और खान-पान की आदतों के विभिन्न जीवंत गुण ही क्यों न हों। वह सही मायनों में इसके सर्वश्रेष्ठ सांस्कृतिक राजदूत रहे हैं। हमें याद आता है कि कैसे उन्होंने ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में ख़ुद को कई भाषाओं में अभिव्यक्त कर भारत की भाषाई विविधता दिखाई। नरेंद्र मोदी का गर्व ख़ुद को श्रेष्ठ महसूस करने को लेकर नहीं, बल्कि अपने आप में सहज होने के बारे में है।

यही बात भारतीयों में भी पहुंच गई है कि वह अपनी विविधतापूर्ण संस्कृति के प्रति हीनता का अनुभव नहीं करते। ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ भारत की वास्तविक सॉफ्ट पावर को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने में शामिल रचनात्मकता का प्रमाण है। नेताओं को नई दिल्ली के अपने दायरों से बाहर निकालकर अहमदाबाद, वाराणसी, चंडीगढ़ या मामल्लपुरम जैसी जगहों पर ले जाकर नरेंद्र मोदी ने दिखाया है कि यह नया भारत दरअसल पुराने और नए, दोनों के साथ सहज है।


मां गंगा को श्रद्धांजलि अर्पित करना केवल मोदी के शब्द नहीं हैं, बल्कि वह तो दुनियाभर में करोड़ों लोगों के विश्वास का प्रतिनिधित्व करते हैं। केदारनाथ की एक गुफा में बैठकर शिव का ध्यान करना हो या भारतीय धर्मग्रंथों से स्वतंत्र रूप से विचार व्यक्त करना, मोदी एक ऐसी सभ्यतागत पहचान को जगाने का प्रतीक हैं, जिसे जबरन नींद में धकेल दिया गया था।

ढाका में ढाकेश्वरी मंदिर का दर्शन, काठमांडू में भगवान पशुपतिनाथ की पूजा-अर्चना या फिर अबू धाबी में पहले मंदिर का उद्घाटन करना, अब भारत में जड़ों से वापस जुड़ने का उत्साह भर गया है। यह ऐसा क्षण है, जिसके लिए लोगों ने बहुत लंबा इंतजार किया।

संवाद और बहस के उदाहरण के तौर पर आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच के महान शास्त्रार्थ से दिए नरेंद्र मोदी के संदर्भ दरअसल एक ऐसी सभ्यता को लेकर एकदम सही समझ है, जो ज्ञान को पूजती है। यक़ीन के जरिए जीतने पर विश्वास करती है और परिस्थिति-पद की परवाह किए बगैर सम्मान की गारंटी देती है।

हां, मोदी बारीकियों का मूल्य जानते हैं। उनके अपनी संस्कृति और सभ्यता के प्रति प्रेम के भाव कभी भी कर्कश या वर्चस्ववादी नहीं होते। यह तो प्रेम की एक स्वचालित अभिव्यक्ति मात्र है, कोई शक्ति का प्रदर्शन नहीं।

सत्ता के शीर्ष पर नरेंद्र मोदी की मौजूदगी के परिणामस्वरूप असली भारत का जागरण हो रहा है। आज जब दुनिया भारत के विश्वगुरु के दर्जे को वापस पाने के लिए नरेंद्र मोदी की पहल को देखती है तो हमें आश्चर्य होता है कि हमारी सभ्यता का यह सरल लेकिन इतना गहरा पहलू सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों के लिए इतने लंबे वक़्त तक कभी भी अजेंडे का विषय नहीं था। शायद इसके लिए एक सच्चे भारतीय का इंतजार था, जो आए और अपनी संस्कृति को अपना ले।

Originally Published: NavbharatTimes 

 


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