भारत ने चुकाया 1951 का कर्ज : गेहूं के बदले भेजी दवा

कहते हैं कि वक़्त बदलते समय नहीं लगता | पर अगर बदलाव बड़ा हो तो शायद कभी-कभी थोडा समय लग भी जाता है | फिर हम जिस घटना का जिक्र करने जा रहे हैं वो तो काफी बड़े बदलाव की शुरुआत है | बात है दो मुल्कों की, भारत और अमेरिका | 

एक वो भी समय था जब भारत को खाने के लाले पड़े थे और भारत को गेहूं के लिये अमेरिका के आगे हाथ फ़ैलाने पड़े थे | एक आज का समय है जब कि अपने देश की जनता की जान बचाने के लिये अमेरिका के राष्ट्रपति भारत के आगे गिडगिडा रहे हैं | अमेरिकी नागरिक अपनी दवाइयों के लिये भारत पर निर्भर होने के लिये मजबूर हैं |

कभी नेहरु ने मांगी थी अमेरिका से मदद 

1951 मे तात्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने देश मे अनाज की कमी होने के कारण अमेरिका से मदद मांगी थी | तब अमेरिका ने भारत की मदद की थी | तात्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन ने भारत को 20 लाख टन आपात मदद के रुप मे दिया था | उन्होंने कहा था कि भारत की जरूरतों के प्रति हम बहरे बने नहीं रह सकते हैं | वो भारत को अमेरिका से दोस्ती से होने वाले फायदे का अहसास कराना चाहते थे | तभी उन्होंने कहा था कि भारत के प्रति दोस्ती और भारतीय लोगों को भूखे नहीं रहने देने की चिंता ही हमे यह कदम लेने पर मजबूर कर रही है | 

दरअसल अमेरिका के भारत की मदद करने के पीछे असली वजह यह थी कि वो भारत को इस बात का एहसास दिलाना चाहता था कि भारत का असली हित पश्चिमी देश के साथ है | उस समय अमेरिका भारत की नीतियों को लेकर भारत से खफा था | इसके बाद भी अमेरिकी कांग्रेस ने लम्बी बहस के बाद भारत की मदद को राजी हो गया था |

आज समय बदल गया

तब से लेकर आज तक समय काफी बदल गया है | आज भारत तथा अमेरिका के सम्बन्ध काफी अच्छे हैं | अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अक्सर भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ करते हैं | भारत आज खाद्यान्नों के मामले मे आत्मनिर्भर हो चूका है तथा कई खाद्यान्नों का निर्यात भी करता है | 

अब भारत पूरी दुनिया मे दवाइयों का निर्यात भी करता है | आज कोरोना की समस्या के कारण अमेरिका को भारत की जरूरत पड़ी है | ऐसे समय मे भारत ने भी उसे निराश नही किया तथा दवाइयों का निर्यात करने का निर्णय लिया है |