हाथरस कांड: आज संवेदना क्यो हो रही है ओझल?

पिछले कई दिनो से देखा जाये तो हाथरस नेताओं का नया ‘तीर्थस्थल’ बनकर उभरा है। हाथरस के पीड़ित परिवार को सांत्वना देने और उसके लिए न्याय की गुहार करते हुए तमाम नेता इस शहर की ओर उसी तरह दौड़े चले जा रहे हैं जैसे वे पहले करते आये है। लेकिन सवाल ये उठता है कि  आखिर अन्याय और अत्याचार के शिकार हुए लोगों के प्रति हमारे नेताओं की संवेदना कुछ खास मामलों में ही क्यों जगती है?

 

हाथरस में खूब दिखा सियासी रस

वैसे हाथरस सालों से काका हाथरसी यानी की हास्य रस के मसहूर कवि प्रभुलाल गर्ग के लिये जाना जाता था लेकिन आजकल यहां सियासत का रस खूब देखा जा रहा है और इस रस को अपनी नौटंकी के जरिये मीडिया लोगों तक पहुंचा रहा है। जबकि मुख्य मुद्दा पूरा तरह से दबता हुआ दिख रहा है। बस सब अपने आप अपने कपड़े फाड़कर सरकार के विरोध में खड़े दिख रहे है। मजे कि बात तो ये है कि यहां सियासी रोटी सेकने वाले किसी जांच की मांग नही कर रहे, बल्कि सरकार खुद CBI की जांच की बात कर रही है तो उसपर भी विरोध किया जा रहा है। जो ये बता रहा है कि किसी को हाथरस की बेटी और उसके परिवार की चिंता नही बल्कि मुद्दाविहीन हो चुके नेताओं को मुद्दा बना रहे इसकी चिंता है और हो भी क्यो न आखिर बहुत दिनो बाद मीडिया का करम जो उन पर हुआ है टीवी पर चेहरा तो दिख रहा है वरना तो बस घर बैठकर विकास की नई नई गाथा को पूरा होते ये देख रहे थे और सोच रहे थे कि अगर सभी काम हो गये तो किस मुद्दे पर चुनाव लड़ेगे। बस क्या था निकल बड़े चेहरा चमकाने। हालाकि गांव की जनता खुलकर इस ड्रामा को देख रही है और बोल रही है कि हमे माफ करो हमारे गांव से जाओ जिससे हम फिर से अपना सादगी भरा जीवन जी सके।

मानसिकता को बदलना होगा

इस घनघोर मौकापरस्त राजनीति का नतीजा यह है कि उस विषाक्त मानसिकता पर प्रहार हो ही नहीं पा रहा, जिसके चलते ऐसी घटनाएं होती हैं। राजनीतिक दलों के लिए दलित उत्पीड़न के मामले में ऐसा मनमाना निष्कर्ष निकाला जाना तो बहुत आसान है कि शासन- प्रशासन संवेदनशील नहीं, लेकिन यह समस्या का सरलीकरण है, क्योंकि इस तरह की घटनाओं के मूल में तो समाज की वह मानसिकता है, जिसके चलते दलित, वंचित समूहों को नीची निगाह से देखा जाता है और वे अन्याय का शिकार बनते हैं। जब जरूरत इस मानसिकता को भी खास तौर पर निशाने पर लेने की है, तब यह बताने की कोशिश की जाती है कि सत्तारूढ़ दल अथवा उसका प्रशासन दलितों के हित की चिंता नहीं कर रहा है। इसे साबित करने में मीडिया का एक हिस्सा भी अतिरिक्त मेहनत करता है। और तो और इस बार तो यूपी को दंगे में जलाने की पूरी साजिश भी रच दी गई थी। जैसे दिल्ली में किया गया था।

सवाल फिर उठता है कि हम कब इन सब से पार पायेगे और इसका जवाब सिर्फ यही है कि देश की जनता को इसके लिए आवाज उठाना पड़ेगा और मिलकर नौटंकी करने वालो की दुकान में ताला लगाना पड़ेगा जिससे नये भारत में नौटंकी कम और समाज में बदलाव ज्यादा दिखे।

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