भारत के लिए अच्छी खबर / मातृ मृत्यु दर में 2013 के बाद से 26.9% की कमी

PM MODI

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ‘स्वस्थ भारत’ का सपना साकार करने के लिए प्रयासरत है। सरकार का लक्ष्य है कि समाज के अंतिम व्यक्ति को भी सभी स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया हो। गुरुवार को जारी सेंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम बुलेटिन-2016 से मिली जानकारी के अनुसार भारत में मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) में 2013 से अब तक 26.9 प्रतिशत की कमी आई है।

26.9% decrease in maternal mortality since 2013 | PC - Pixabay

दक्षिण भारतीय राज्यों में प्रति एक लाख जन्म पर एमएमआर 77 से घटकर 72 पर आ गया है जबकि अन्य राज्यों में यह आंकड़ा 93 से घटकर 90 हो गया है। महापंजीयक कार्यालय की ओर से जारी विशेष बुलेटिन के मुताबिक 2011-2013 के बीच एमएमआर 167 था जो 2014 से 2016 के बीच घटकर 130 पर आ गया। 2015-17 में इसमें और कमी आई और यह 122 पर आ गया।

इस प्रकार पिछले सर्वे 2014-2016 के मुकाबले इसमें 6.15 फीसद की कमी आई है। बुलेटिन में कहा गया, ‘यह उत्साहजनक है कि मातृ मृत्यु दर 2014-2016 के 130 से घटकर 2015-2017 में 122 रह गई। सबसे अधिक कमी सशक्त कार्य समूह (ईएजी) राज्य असम में हुई जहां एमएमआर 188 से घटकर 175 पर आ गया है।’ मातृ मृत्यु दर को बेहतर तरीके से समझने के लिए खासतौर पर क्षेत्रीय आधार पर, सरकार ने राज्यों को ईएजी, दक्षिण राज्यों और ‘अन्य’ में श्रेणीबद्ध किया है।

स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु पहले ही वैश्विक सतत विकास लक्ष्य प्रति एक लाख जन्म पर 70 एमएमआर का लक्ष्य हासिल कर चुके हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना भी लक्ष्य के करीब हैं। ईएजी राज्यों में बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और असम आते हैं। वहीं दक्षिणी राज्यों में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु आते हैं। ‘अन्य’ की श्रेणी में बचे हुए राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को रखा गया है।

गौरतलब है कि मातृ मृत्युदर पर भारत में पहली रिपोर्ट अक्टूबर 2006 में जारी की गई थी। इसमें 1997 से 2003 के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पिछले साल एमएमआर को कम करने के लिए भारत की प्रशंसा करते हुए कहा कि वह सतत विकास लक्ष्य को हासिल करने के रास्ते पर है। संयुक्त राष्ट्र ने 2030 तक एमएमआर को प्रति एक लाख जन्म पर 70 से कम करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

मोदी राज में देश के गरीबों की स्थिति सुधरी है और वे खुशहाल हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी की आयुष्मान भारत योजना उनके लिए वरदान साबित हो रही है। देश भर में बड़ी संख्या में लोगों को इसका लाभ मिल रहा है। मोदी सरकार का मानना है कि देश के नागरिक स्वस्थ रहेंगे तो देश स्वस्थ रहेगा। जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार की योजनाओं का यही मूलमंत्र रहा है। इस सरकार ने हेल्थ सेक्टर में ऐसे कई बड़े कदम उठाए हैं, जिनसे स्वास्थ्य को लेकर देशवासियों की चिंताएं पहले से कहीं कम हो गई हैं। एक नजर डालते हैं उन कदमों पर-

बच्चों और माताओं के लिए राष्ट्रीय पोषण मिशन
इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर राष्ट्रीय पोषण मिशन की शुरुआत की गई। इसका उद्देश्य है बच्चों और माताओं को सही पोषण देना। इस मिशन को करीब 9 हजार करोड़ रुपये की राशि के साथ शुरू किया गया है। बच्चों को तंदुरुस्त रखने के उद्देश्य के साथ ही इस मिशन के अंतर्गत आवश्यक पोषण और प्रशिक्षण, खासकर माताओं की ट्रेनिंग की व्यवस्था की गई है।

जन औषधि केंद्र में सस्ती दवाएं
अपनी सेहत को दुरुस्त रखने के लिए जनसामान्य को जरूरत की दवाइयां सस्ती कीमत पर मिल सके इसी दिशा में उठाया गया यह एक बड़ा कदम है। जन औषधि केंद्रों का संचालन केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्रालय की निगरानी में हो रहा है। देश भर में 3000 से अधिक जन-औषधि केंद्र खोले गए हैं जहां 800 से ज्यादा दवाइयां कम कीमत पर उपलब्ध कराई जा रही हैं।

सुरक्षित मातृत्व से जुड़ी अनेक पहल
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान – इसके अंतर्गत सरकार डॉक्टरों से मुफ्त में इलाज करने का अनुरोध करती है। सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत गर्भवती महिलाओं की प्रसवपूर्व जांच की जाती है।

मातृत्व अवकाश अब 26 हफ्ते का – मोदी सरकार कामकाजी महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश की अवधि को 12 हफ्ते से बढ़ाकर 26 हफ्ते का कर चुकी है। इससे महिलाओं को प्रसूति के लिए अवकाश लेने की सुविधा तो मिल ही रही है, अवकाश की अवधि में माताओं को बच्चे की अच्छी तरह से परवरिश करने का अवसर भी मिल रहा है।

प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना – मां और शिशु का उचित पोषण हो, इसे प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत सुनिश्चित किया गया है। इसके अंतर्गत गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए 6 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है।