चुनाव से पहले पार्टियों की ‘फ्री’ वाली पॉलटिक्स

चुनाव करीब हैं। पार्टियां वोटरों को लुभाने की हर कोशिश में लग गई हैं। नई-नई स्‍कीमों और ऑफरों से उनका ध्‍यान खींचा जा रहा है। मुफ्त बिजली, पानी और हेल्‍थ सर्विस देने की बात पुरानी हो चुकी है। गाड़ी इससे कहीं आगे निकल गई है। फ्री की फेहरिस्‍त में टैबलेट, लैपटॉप और घर शामिल हो गए हैं। पार्टियां इन वादों को अपने मेनिफेस्‍टो में भी शामिल कर रही हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्‍या चुनाव से पहले ‘फ्री’ बांटने की होड़ का कुछ फायदा होता है? क्‍या वोटरों का मूड इससे वाकई बदलता है? और क्या ये एक बेहतर राजनीति है या सिर्फ लालच देकर सत्ता तक पहुंचने का एक तरीका?

ये कॉम्पिटिशन है कड़ा

पिछले कुछ सालों में चुनाव से पहले मुफ्त में कुछ देने की घोषणा का ट्रेंड बढ़ा है। पार्टियां इसे मतदाताओं को आकर्षि‍त करने का सबसे दमदार तरीका मनाने लगी हैं। वैसे पहले ये दक्षिण भारत में ज्यादा देखा जाता था लेकिन पिछले कुछ सालो से उत्तर भारत में भी मुफ्त में देने की सियासी दांव अब पार्टियां चलने लगी है जिससे मुख्य मुद्दा खो सा गया है। आज देखा जा रहा है कि फ्री गैजेट्स और कैश इंसेंटिव जैसे नए ऑफर सामने आ गए। कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों ने चुनाव जीतने पर हेलीकॉप्टर देने और चांद की सैर कराने तक की घोषणा कर दी। बेशक ये फिजूल थीं, लेकिन गिनती तो इनकी भी है। कॉम्पिट‍िशन कितना तगड़ा हो चुका है इसका अंदाजा पंजाब में आप की घोषणाओं से लग जाता है। पार्टी सत्ता में आने पर राज्‍य में हर घर को 300 यूनिट बिजली मुफ्त देने, 24 घंटे बिजली आपूर्ति उपलब्ध कराने और सरकारी अस्पतालों में इलाज और दवाएं मुफ्त मुहैया कराने का वादा कर चुकी है। यही भी कहा गया है कि सत्‍ता में आने पर पार्टी राज्य में हर महिला के खाते में प्रति माह एक हजार रुपये डालेगी। जिन बुजुर्ग महिलाओं को पेंशन मिल रही है, उन्हें भी यह रकम दी जाएगी। ऐसे तमाम वादे पार्टिया कर रही है। राजनीति के जानकारो की माने तो ये वादे सिर्फ चुनावी वादे होते है और अगर ये पूरे कर दिये जाते है तो भी राज्य को आर्थिक तौर पर कमजोर करते है जो देश और राज्य दोनो के लिए घातक होते है।

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मुफ्त के बजाये राज्य को मजबूत करने का अजेंडा बताये

सत्‍ता में आने पर अगर कोई पार्टी अपने चुनावी वादे को पूरा करती है तो निश्चित ही लोगों को कुछ राहत मिलती है। हालांकि, जो लोग मुफ्त सेवाओं का मजा लेते हैं या उनका लाभ उठाते हैं, उन्हें इस सच को नहीं भूलना चाहिए कि ये मुफ्त की चीजें किसी राजनीतिक दल की जेब से नहीं बल्कि टैक्‍सपेयर्स के पैसे से आती हैं। इसका एक मकसद गरीबों की क्षमता बढ़ाना, गरीबी कम करना और लक्षित लाभार्थियों को सशक्त बनाना है। ऐसे में इसका सही हाथों में जाना जरूरी है। अगर ऐसा नहीं होता है तो इसके नुकसान ही नुकसान हैं। यह किसी भी राज्‍य के संसाधन पर बोझ बढ़ाता है। इस बोझ को कर्ज लेकर पूरा किया जाता है। इस तरह तमाम दूसरी स्‍कीमों से कटौती करनी पड़ती है। इसका सबसे बड़ा खामियाजा इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर प्रोजेक्‍टों को भुगतना पड़ता है। उस स्थिति में तरक्‍की की रफ्तार सुस्‍त पड़ती है।

इसलिये मुफ्तखोरी की सियासत करने वालो से जनता को थोड़ा सावधान होना पड़ेगा क्योंकि पहले तो मुफ्त योजना के नाम पर ये आपको सपने दिखाते है फिर कही ना कही इसका पैसा घुमाकर आपसे ही ले लेते है। इस लिये फ्री की घोषणा वाली सियासत से हो जाओ सावधान।