मुफ्त का अर्थशास्त्र देश के लिये बन सकता है विनाश

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देश की सियासत में एक नई प्रथा चल गई है जनता के बीच में मुफ्त योजनाओं की घोषणा करना और सत्ता हासिल करना। वैसे सत्ता हासिल करने के लिये ये योजना जरूर अच्छी होगी लेकिन क्या इससे देश का विकास हो पायेगा ये सवाल इस वक्त लाजमी बनता है।

ये ध्यान रहे कुछ भी फ्री नहीं मिलता

नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन की एक किताब है ‘देअर इज नो सच थिंग एज फ्री लंच’। इसमें उन्होंने लिखा है कि मुफ्त में कुछ नहीं मिलता। इसका भुगतान आज नहीं तो कल और कल नहीं तो परसों करना ही पड़ता है। मुफ्त कही जाने वाली चीजों का भुगतान भी जनता के टैक्स के पैसे से ही करना पड़ता है। यह टैक्स केवल अमीर ही नहीं गरीब भी देते हैं। दुनिया का एक देश वेनेजुएला जिसने अपने देश में जनता के लिये बहुत कुछ फ्री कर दिया था जिसका असर आज ये हुआ कि वहां की अर्थव्यवस्था की हालत ये हो गई कि देश को बहुत कुछ गिरवी रखना पड़ा। इसी तरह अपने देश में कुछ राज्यों ने किसानों को मुफ्त बिजली देने की होड़ लगी थी। नतीजा यह हुआ कि राज्यों के बिजली बोर्ड दिवालिया हो गए। न बिजली रह गई और न बिजली खरीदने के लिए पैसा। ऐसे में अगर सभी फ्री का फार्मूला अपना कर सत्ता में आने की कवायद करेगे तो वो सत्ता में तो आ सकते है लेकिन राज्य की माली हालत खराब हो सकती है। सरकार मुफ्त में क्या और कितना दे सकती है, यह इससे तय होना चाहिए कि सरकार के पास इस मद में खर्च करने के लिए अतिरिक्त पैसे हैं या नहीं अगर पैसे नहीं है तो ऐसे वायदे नही करना चाहिये क्योकि इससे सियासत तो चमक सकती है लेकिन देश का बुरा हाल हो सकता है। हालाकि मोदी सरकार की फ्री देने की स्कीम कुछ दूसरी तरह की है जिससे नुकसान नही होता है।

मोदी सरकार की फ्री योजना से नहीं नुकसान

मसलन आप उज्जंवला, शौचालय, पीएम आवास, बिजली कनेक्शन और इसी तरह की दूसरी योजनाओं में से कोई भी योजना लगातार या महीने दर महीने कुछ भी मुफ्त नहीं देती। एक बार सब्सिडी मिलती है। बाकी लोगों को अपना पैसा लगाना पड़ता है। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं। उज्ज वला की ही बात करें तो आठ करोड़ से ज्यादा लोगों को सिर्फ गैस का कनेक्शन मुफ्त मिला। अब वे गैस सिलिंडर खुद भरवा रहे हैं। इससे उसी अनुपात में सिलिंडरों का उत्पादन, रसोई गैस की बिक्री, डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क बना है। इससे लोगों को रोजगार मिला है। रसोई गैस के इस्तेमाल से गरीब तबके के लोगों में सशक्तीकरण का भाव आता है और लकड़ी एवं कोयले के धुएं से होने वाली बीमारियों से निजात मिलती है तो उस पर होने वाला खर्च भी बचता है। दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि लोगों के हाथ में सीधे नकद राशि देने से उपभोग पर सीधा असर पड़ता है। इसीलिए सब्सिडी के जरिये सामान सस्ता देने के बजाय सब्सिडी की राशि सीधे लाभार्थी के खाते में देने को बेहतर माना जाता है। केंद्र सरकार कई चीजों के लिए ऐसा कर चुकी है। अब उर्वरक सब्सिडी किसानों के खाते में सीधे भेजने की तैयारी है। ये सारी बातें अपनी जगह, लेकिन बुनियादी ढांचे के बिना गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी। केंद्र सरकार इसीलिए अगले पांच साल में इस मद में एक सौ तीन लाख करोड़ रुपये खर्च करने जा रही है।

मतलब साफ है कि जनता को लुभाने के लिये फ्री का एलान जरूर सरकार करे, लेकिन उसे ये भी ध्यान रखना चाहिये, कि इससे देश की आर्थिक हलात खराब नही होने चाहिये क्योकि ये कहावत सही है, मुफ्त का चंदन घिस मेरे नंदन से परेशानी बाद में आम लोगो को ही होती है।

 


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