सहकारिता मंत्रालय का गठन, फिर इसकी कमान अमित शाह के हाथ में देकर पीएम मोदी ने भ्रष्टाचार पर किया एक और वार

7  साल पहले जब मोदी सरकार सत्ता में आई थी तभी उसने साफ कर दिया था कि सरकार में भ्रष्टाचार को न बर्दाश्त किया जायेगा और ना ही भ्रष्टाचारियों को छोड़ा जायेगा। इसी क्रम में सरकार ने कई योजनाएं बनाई जिसका असर जमीनी हकीकत में आज देखा जा रहा है। लेकिन अब सरकार ने नए सहकारिता मंत्रालय के गठन का निर्णय लिया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को देश के पहले सहकारिता मंत्री के रूप में बड़ी जिम्मेदारी दी गई है जिसके बाद कुछ लोगों में बेचैनी बढ़ गई है कि कहीं सहकारिता से विकास का मंत्र पूरे भारत में लागू होने पर गरीब किसान और लघु व्यवसायी बड़ी संख्या में सशक्त ना हो जाये जिससे मोदी सरकार की छवि और ना निखर के सामने आ जाये।

मोदी सरकार ने क्यों बनाया नया सहकारिता मंत्रालय

सबसे पहले तो ये जानिए कि भारत सरकार ने आखिर सहकारिता के रूप में एक नए मंत्रालय की ज़रूरत क्यों समझी। केंद्र ने सहकारिता मंत्रालय की घोषणा करने के बाद इसकी कमान गृह मंत्री अमित शाह के हाथो में दी। केंद्र सरकार का कहना है कि इससे ‘सहकार से समृद्धि’ के लक्ष्य को पाने में मदद मिलेगी। देश में सहकारिता आंदोलन को ये मंत्रालय मजबूत करेगा। लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य ये है कि ये सहकारिता आंदोलन को एक अलग प्रशासनिक, कानूनी और नीतिगत ढाँचा व वातावरण प्रदान करे। ये मंत्रालय सहकारी समितियों को जमीनी स्तर तक पहुँचने वाले एक सच्चे जन-भागीदारी आधारित आंदोलन को मजबूत बनाने में भी सहायता प्रदान करेगा। सहकारिता के बारे में बता दें कि ये ऐसा आर्थिक विकास मॉडल है, जहाँ इसके हर सदस्य को अपनी जिम्मेदारी निभानी होती है और इससे उनका और देश का फायदा होता है। केंद्र सरकार ने कहा, “यह मंत्रालय सहकारी समितियों के लिए ‘कारोबार में सुगमता’ के लिए प्रक्रियाओं को कारगर बनाने और बहु-राज्य सहकारी समितियों  के विकास को सक्षम बनाने की दिशा में कार्य करेगा। समुदाय आधारित विकासात्मक भागीदारी के प्रति हमारी गहरी प्रतिबद्धता है। बता दें कि केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट के दौरान ही इस सम्बन्ध में घोषणा की थी। अब इसे पूरा किया गया है। बहुराज्यीय सहकारी समितियों को अब इस मंत्रालय से सीधे मदद मिलेगी। बैंकिंग, खेती, चीनी मिल संचालन और डेयरी फार्मिंग जैसे कई क्षेत्र हैं, जहाँ लोग सहकारी संस्था बना कर साझा लक्ष्य के लिए अपना-अपना योगदान देते हैं। सहकारिता का प्रभाव इसी से समझ लीजिए कि देश में फ़िलहाल 1.94 लाख कोऑपरेटिव डेयरी सोसाइटी और 330 चीनी मिल एसोसिएशन हैं। भारत में कृषि में मदद के लिए ग्रामीण स्तर पर किसानों द्वारा कई ‘प्राइमरी एग्रीकल्चरल क्रेडिट सोसाइटीज’ का गठन किया जाता है। किसानों को इससे सुगमता से कर्ज उपलब्ध हो जाता है। इसके लिए जिला एवं राज्य स्तर पर सहकारी बैंक होते हैं। 363 जिला सहकारी और 33 राज्य सहकारी बैंक इस काम में लगे हुए हैं। 2019-20 में देश में 1539 शहरी सहकारी बैंक थे। साथ ही 95,238 ऐसी सोसाइटियाँ थीं।

अमित शाह को ही क्यों दी गई सहकारिता मंत्रालय की कमान?

अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि आखिर इसकी कमान अमित शाह के हाथ में ही क्यों? इसका एक ही कारण है- लंबा अनुभव। प्रशासनिक रूप से सक्षम अमित शाह का गुजरात में सहकारिता को लेकर काम करने का अच्छा अनुभव है। एक समय उन्हें राज्य में सहकारिता आंदोलन का पितामह कहा जाने लगा था। गाँव, गरीब और किसानों के नेटवर्क से राज्य ने विकास की नई ऊँचाइयों को छुआ। अमित शाह भाजपा की राष्ट्रीय सहकारिता प्रकोष्ठ के संयोजक के पद पर भी रह चुके हैं। मात्र 36 वर्ष की उम्र में उन्हें अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक (ADCB) का अध्यक्ष चुना गया था। उस समय बैंक 20.28 करोड़ रुपए के घाटे में चल रहा था। शाह ने मात्र एक साल में बैंक को संकट से उबारा और 6.60 करोड़ रुपए के लाभ में लाकर 10% के मुनाफे का वितरण किया। इस तरह इस क्षेत्र से उनका पुराना और गहरा नाता है। कुछ ऐसी ही कहानी गुजरात के आणंद में स्थित अमूल डेयरी की भी है। दिसंबर 1946 में इसका जन्म एक सहकारी आंदोलन के रूप में ही हुआ था। इसी क्रांति की वजह से भारत विश्व में सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक बना। खेड़ा जिले में पहले किसानों की स्थिति दयनीय थी, लेकिन उन्हीं किसानों ने एक सहकारी समिति बना कर कई दुग्ध उत्पादन केंद्र बनाए और आज सफलता की ऊँचाई को छू रहे हैं। आज करीब 11,000 गाँवों से ये किसान प्रतिदिन 60 लाख लीटर दूध इकट्ठा करते हैं। इसके लिए तीन चरणों वाले मॉडल का उपयोग किया गया था। प्राइमरी प्रोड्यूसर, यानी गाँव की संस्थाओं से दूध लिया जाता था। दूसरा चरण, यानी दूध को सहयोगी भंडारों के पास भेजा जाता था जहाँ उन्हें संरक्षित रखा जाता था। फिर अंतिम चरण में इसे बेचा जाता है। इस तरह इसमें बिचौलियों की भूमिका ही ख़त्म हो गई। गुजरात में सहकारिता से बड़ी संख्या में महिलाएँ भी जुडी हैं।

अमित शाह को केंद्रीय सहकारिता मंत्री बनाए जाने का एक कारण ये भी है कि देश के कई सहकारिता बैंक और समितियाँ आज घोटाले से त्रस्त हैं और शाह को ऐसे मामलों में कड़ाई से काम लेने के लिए जाना जाता है। महाराष्ट्र में कोऑपरेटिव बैंक घोटाला सामने आया था, जिस मामले में ED (प्रवर्तन निदेशालय) कार्रवाई भी कर रही है और इस बात से कुछ लोग परेशान भी हैं क्योंकि उन्होंने तो इन समितियों को अपने परिवार में ही बदल कर रख दिया था लेकिन अब जब मंत्रालय ही अलग होगा और उसका मंत्री अमित भाई जैसा होगा तो बिचौलियों का परेशानी बढ़ना लाजमी है बस इसी बात से कुछ लोग परेशान हो रहे हैं।