क्या हम अपनी कला- संस्कृति को भूलते जा रहे हैं?

देश की सियासत जब साल भर मई जून की तरह गर्म बनी रहें.. और सियातदार एक दूसरे पर सिर्फ आग ही बरसाते हुए दिखाई दे, तो नजर मौसम की तरफ कर लेना चाहिये। जी हां, आजकल सावन चल रहा हैं.. वो मौसम जिस मौसम में धरती झूमती हुई दिखाई देती हैं, एक वक्त था जब हम इस मौसम में किसी बागीचे की तरफ दौड़ने लगते थे लेकिन अब हम सिर्फ इस मौसम मे कपड़े उठाने या दरवाजे खिड़कियाँबंद करने ही निकलते हैं, क्योंकि अपार्टमेंट मे बगीचा तो हो नही सकता। लेकिन इसका विकल्प अप्पू या पप्पू घरो में रेनड़ांस को जरूर हमने बना लिया हैं।

काले घने बादल बने सिर्फ एक खबर

वही टीवी के इस दौर में मॉनसून के काले घने बादल किसी अशुभ समाचार के सिर्फ ब्रेकिंग न्यूज ही हो गये हैं। जिदंगी की भागा दौड़ा में हम कजरी, ठुमरी, कोयल की धुन सिर्फ यू टूयब पर ही धूड़ते हुए दिखाई देते हैं। इतना ही नही सावन के झूलो के बीच सजे उन मेलो को भी हम भूलते जा रहे हैं जो हमे कभी सावन मे मदमस्त कर दिया करते थे।

सोशल मीडिया ने ली जगह

उस महान रचना मेघदूत को आज हम घरों में सजाते तो जरूर हैं, लेकिनउसे पढ़ने के लिए वक्त का अभाव जरूर दिखता हैं क्योंकि आज हमें सोशल मिडिया में एक दूसरे की चुगली करने से फुर्सत कहा। या यूं कहे कि कट-कापी-पेस्ट ने आदत इस कदर खराब कर दी है, कि हम इससे ज्यादा सोचते ही नही। तभी तो जानलेवा बन रहे किकी गाने पर तो हम खूब झूम रहे हैं और ट्वीट में विडियो भी डाल रहे हैं लेकिन सावन के गानो के आते ही चैनल बदलने में हमें देर नही लग रही है।

ऐसे में बस सवाल यही खड़ा हो रहा है कि आखिर हम इस दौड़ का हिस्सा बनते जा रहे है। क्यों हम अपने गौरवशाली संस्कृति से भटक रहे है। इस सवाल का जवाब मै खोज रहा हूँ और आशा करता हूँ कि इस को पढ़ कर आप भी इस सवाल का जवाब जरूर खोजेंगे।