500 साल पहले तुलसीदास ने रामचरित मानस में बात दिया था ‘कोरोना वायरस’ के बारे में

आजकल अगर कोई सबसे चर्चित शब्द है तो वो है ‘कोरोना’। इसकी भयवाहता ने पूरी दुनिया को बदल कर रख दिया है। सोचने से ले कर जीने तक के तरीके बदल गए हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब भारत ऋषि मुनियों का देश रहा है, भारत की विरासत और सभ्यता इतनी मजबूत रही है तो क्या भारत के पुरातन शास्त्र या पुरातन ग्रंथ में कहीं इस बीमारी का वर्णन है? क्या किसी ऋषि महर्षि ने ऐसी कोई बीमारी कि भविष्यवाणी की थी? क्या किसी प्रकार से कोई इशारा इस ओर किया गया था?

जवाब सुन कर फिर से आप अपनी सभ्यता और पुरातन इतिहास पर गर्व करेंगे। भारत के सबसे लोकप्रिय ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ में तुलसीदास जी ने भविष्य के इस बीमारी का जिक्र किया है। इस ग्रंथ में भविष्य के बारे में कई संकेत हैं। तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ की रचना कई खंडों में किया है। सन् 1574 में लिखी गई तुलसीदास कृत रामचरित मानस के आखिरी अध्याय ‘उत्तरकाण्ड’ में भविष्य के इस तबाही के बारे में बताया गया है। इसमें रावण वध के पश्चात राम राज्य और भविष्य की घटनाओं का वर्णन है. इसी उत्तरकांड की चौपाई संख्या 120 में कोरोना संकट के लक्षणों का वर्णन किया गया है.

 

* सब कै निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥

सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा॥॥

भावार्थ:-जो मूर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। हे तात! अब मानस रोग सुनिए, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं॥॥

 

* मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥

काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥॥

भावार्थ:-सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है॥॥

 

* प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई॥

बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना॥॥

भावार्थ:-यदि कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें (मिल जाएँ), तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनता से प्राप्त (पूर्ण) होने वाले जो विषयों के मनोरथ हैं, वे ही सब शूल (कष्टदायक रोग) हैं, उनके नाम कौन जानता है (अर्थात्‌ वे अपार हैं)॥16॥

 

चौपाई :

* ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई॥

पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई॥॥

भावार्थ:-ममता दाद है, ईर्षा (डाह) खुजली है, हर्ष-विषाद गले के रोगों की अधिकता है (गलगंड, कण्ठमाला या घेघा आदि रोग हैं), पराए सुख को देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है। दुष्टता और मन की कुटिलता ही कोढ़ है॥17॥

 

* अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ॥

तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिधि ईषना तरुन तिजारी॥॥

भावार्थ:-अहंकार अत्यंत दुःख देने वाला डमरू (गाँठ का) रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ (नसों का) रोग है। तृष्णा बड़ा भारी उदर वृद्धि (जलोदर) रोग है। तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं॥18॥

 

* जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लगि कहौं कुरोग अनेका॥॥

भावार्थ:-मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँ तक कहूँ॥॥

 

दोहा :

* एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि।

पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि॥॥

भावार्थ:-एक ही रोग के वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत से असाध्य रोग हैं। ये जीव को निरंतर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशा में वह समाधि (शांति) को कैसे प्राप्त करे?॥॥

इन पंक्तियों में स्पष्ट रुप से बताया गया है कि चमगादड़ के कारण महामारी फैलेगी. जिसकी वजह से लोगों को बहुत दुख होगा। कफ यानी सर्दी खांसी की प्रधानता होगी। सीने में जलन होगी, तेज बुखार की वजह से लोग अचेत हो जाएंगे।

 

इस बीमारी का इलाज समाधि यानी एकांतवास करने से होगा। इसके अतिरिक्त कोई और उपाय काम नहीं आएगा।      

 

Input from Zee News