किसानों के रूप में अलगावादियों से किसानों को होना पड़ेगा सावधान

किसान आंदोलन में पंजाब के किसानों की बड़ी भागीदारी देखकर अलगाववादी तत्व पुन: खालिस्तान की मुहिम को हवा देने की तिकड़म कर रहे हैं। वैसे तो खालिस्तानी अलगाववाद को उभरे चार दशक हो गए, लेकिन ‘संवेदनशीलता’ के नाम पर आज भी इस कुविचार को लेकर चुप्पी साधी जाती है। इस मामले में न केवल सच बताने से बचा जाता है, बल्कि उस पर पर्दा भी डाला जाता है। फलत: राष्ट्र पर आघात करने वाले हानिकारक हिंदू विरोधी अपने खोल से बाहर आकर लोगों को भड़काने लगते हैं।

गलत विचारों को उनकी पोल खोलकर किया जा सकता है परास्त

वास्तव में विचारों को ताकत से नहीं दबाया जा सकता। अलगाववाद का उपाय सेंसरशिप नहीं है। उससे दुष्प्रचार और अफवाहों को मदद मिलती है। अलगाववादी विचारों के प्रभाव में आने वालों को लगता है कि सत्ताधारी जबरदस्ती कर रहे हैं, किंतु कश्मीरी-इस्लामी से लेकर खालिस्तानी अलगाववाद तक हमारे नेता दशकों से वही गलती दोहराते रहे हैं। गांधी जी से लेकर आज तक यह भूल यथावत है। गलत विचारों को चुप्पी साधकर नहीं, बल्कि उनकी पोल खोलकर ही परास्त किया जा सकता है। कुछ लोगों की ‘भावना’ के नाम पर उससे बचना दोहरा-तिहरा हानिकारक होता रहा है।

 

 

सच के अस्त्र से ही अलगाववाद का हो सकता अंत

किसान आंदोलन के दौरान जिस तरह से किसानों को गुमराह करके कुछ अलगाववादी तत्व इस प्रदर्शन की दिशा मुड़ने में लगे है उसकी काट सिर्फ किसानों को सच बताने से ही होगी ऐसा हो भी रहा है जब जब पीएम ने मंच से किसान आदोलन के भ्रम को दूर करने की कोशिश की है किसानों को ये जरूर लगा है कि कोई एक वर्ग है जो उनके कंधो पर बंदूक रखकर निशाना साध रहा है। तभी कई किसान संगठन आज सरकार के बिल के समर्थन कर रहे है। तो कुछ खुद किसानों को समझाने के लिए आंदोलन स्थल पर उतर आये है कि ये बिल किसान विरोधी नही बल्कि किसान के हित में है और ऐसी काफी खबरे  आप सोशल मीडिया पर देख भी रहे है जिसमें किसानों का रुक बिल को लेकर बदल रहा है। यानी की कही न कही आंदोलन में आये अलगाववादी अब परास्त होते हुए दिख रहे है।

जब ये अलगाववादी अब देख रहे है कि उनकी हार इस आंदोलन में पक्की है क्योकि किसानों के सामने उनकी हकीकत आ चुकी है तो वो इस आंदोलन को हिंसात्मक बनाने में लग गये है कही पुलिस पर वाहन चला रहे है तो पीएम मोदी को गाली दे रहे है जिससे ये साफ होता है कि कही न कही अब वो ये भी मान रहे है कि किसान के नाम पर उनकी हठधर्मिता अब ज्यादा दिन नही चलने वाली।