यूपी चुनाव के बाबत विपक्ष का चुनावी ड्रामा

कई दशक पहले हिन्दी मूवी में एक गाना आया था दौड़ा दौड़ा भागा भागा सा.. आज देश के विपक्ष पर ये गाना बिलकुल फिट बैठता है क्योंकि लखीमपुर खीरी में हुए कांड के बाद विपक्ष का हर दल पहले लखीमपुर पहुंचने की होड़ मची है। मानो सभी के मन में बस यही सपने पल रहे है कि इस मुद्दे को भुनाकर बस यूपी की सत्ता का ताज अपने नाम करना है। इसीलिये विपक्ष सत्ता पक्ष से भिड़ने की जगह खुद आपस में आगे निकलने की होड़ में लगी हुई है।

सियासी रोटी सेंकने में लगा विपक्ष

लोकतंत्र में सत्ता पानी है तो जनता का हितैषी दिखाना पड़ेगा और यही काम करने में इस वक्त देश का विपक्ष लगा हुआ है। क्योकि जिस तरह से सत्ता में रहते इन लोगो ने काम किये है उससे तो जनता कभी भी इन्हे वोट नहीं देगी। बस इसीलिये विपक्ष एक ऐसा माहौल बनाना चाहती है जिससे अराजकता बढ़े और वो सरकार पर कानून व्यवस्था के नाम पर वोट हासिल कर सके। देश की सबसे पुरानी पार्टी का अगर इतिहास देखा जाये तो वो ऐसा पहले भी कर चुकी है। फिर वो 1984 हो या फिर 2004 हर बार अराजकता और भ्रम का माहौल बनाया गया है जिससे सत्ता में वापसी हो सके ऐसा ही माहौल फिर तैयार किया जा रहा है। हालांकि जनता इस बार उनके इस दांव में फंस नहीं रही है और वो हकीकत अच्छी तरह से जान रही है। किसानों के कंधे पर बंदूक रखकर कौन आखिर सियासत चमकाना चाहता है।

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सरकार ने तुरंत लिया ऐक्शन

विपक्ष जहां लखीमपुर खीरी में किसानो की मौत पर सियासत में जुटी है तो दूसरी ओर सरकार ने इस मुद्दे पर किसान के परिवार वालों की बात मानते हुए तुरंत एक्शन शुरू भी कर दिया है। सरकार ने जहां मरने वालो को 45 लाख रुपये और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी तो वही घायलों को 10 लाख रूपये देने का ऐलान किया है। वही मामले की जांच सीबीआई के द्वारा करवाने की मांग भी मान ली गई है तो सांसद के लड़के के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कर ली गई है जो ये बताता है कि सरकार इंसाफ देने में कोई भी हद तक जा सकती है। लेकिन इसके बाद विपक्ष सिर्फ लखीमपुर खीरी जाकर माहौल खराब करना चाहती है और उसपर रोटिया सेंकना चाहती है।

वेसे देखा जाये तो 10 महीने से चल रहा किसान आनंदोलन शुरू से ही आक्रमक रहा है। हालांकि सरकार ने उनकी आक्रमकता का जवाब शांति पूर्वक तरीके से ही देते आये है फिर वो लालकिले का कांड हो या फिर अन्य राज्य में हुआ हंगामा हर जगह सरकार का रवैया वैसा रहा है जैसे वो किसान को अपना ही समझते है शायद इसी बात को आंदोलनकारी अपनी ताकत समझकर गलत कदम उठा रहे है जो लोकतंत्र में गलत ही होता है।