भारत के रूख के बाद सकते में ड्रैगन

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चीन के साथ चल रहे विवाद में अमेरिका सहित तमाम देश भारत के साथ खड़े हैं। लेकिन भारत इसके बावजूद अपने दम पर चीन को अकेले ही चुनौती देने का विश्वास रखता है, भारत ने दिखाया है कि वह खुद ही चीन के सामने किसी भी मुद्दे पर मजबूती से खड़ा हो सकता है। जून में चीन और भारत की सेनाओं के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद से दोनों देशों के बीच कई वार्ताएं हुई हैं और पूरी तरह न सही, कुछ हद तक सीमा पर स्थिति सामान्य भी हुई है।

इस बार भारत के रुख से चीन है हक्का-बक्का

लद्दाख में चल रहे विवाद में जिस तरह से भारत ने इस बार अपना रूख रखा है और चीन को साफ साफ सख्त लेहजे में संदेश दे दिया है कि जब तक वो अपनी पुरानी स्थिति में नही आता तबतक भारत सीमा पर सख्त रुख अपनाता रहेगा। इसी सख्ती के चलते चीन हक्का बक्का है क्योंकि इससे पहले इस तरह का रुख चीन वार्ता में नही देखा जाता था। यूरोपियन फाउंडेशन फॉर साउथ एशियन स्टडीज की माने तो 2017 में डोकलाम की तरह यहां भी चीन की आक्रामकता के सामने भारतीय राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व को दृढ़ रवैया और निश्चय ने चीन को हैरान कर दिया है।

ताकत जुटा रहा है भारत

दूसरी तरफ चीन से विवाद बढ़ते ही भारत ने अपनी सैन्य ताकत को मजबूत बनाने के लिए युध्दस्तर की तैयारी शुरू कर दी है। लगातार भारत सीमा पर सैन्य अभ्यास कर रहा है। तो सर्दी के दिनो में कैसे इन इलाको में पैर जमा रहे इसके लिए जवानों के पास रसद तो दूसरे सामान भी पहुंचाया जा रहा है इसके साथ साथ हर सीजन पर देश से ये इलाका जुड़ा रहे इसकी भी तैयारी भारतीय फौज करने में लगी है।

अपनी रक्षा के लिए कसर नहीं छोड़ रहा भारत

भले ही चीन भारत से ‘आसान रास्ता’ अपनाने को कह रहा हो, भारत का मानना है कि वह अब दृढ़ है और मजबूत है कि सीमा पर गंभीर टकराव के लिए खड़ा होकर चीन की अप्रत्याशित आक्रामक गतिविधियों का सामना कर सकता है। भारत को उम्मीद है कि मौजूदा टकराव को बातचीत से सुलझा लिया जाएगा लेकिन वह इस बात की कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता कि अगर टकराव बढ़े तो वह अपने क्षेत्र की रक्षा कर सकता है। थिंक-टैंक ने यहां तक कहा है कि इसलिए बेहतर होगा कि दोनों देश आपसी सहमति से समाधान निकालें जिसमें चीन सम्मान के साथ पीछे हट जाए। इसमें चीन और भारत, दोनों के करीबी दोस्त रूस की बड़ी भूमिका भी बताई गई है।

किसी भी टकराव के लिए मजबूत

EFSAS का कहना है कि भले ही चीन सीमा मुद्दे की जगह द्विपक्षीय संबंध सुधारने का लालच दे रहा हो, भारत की इस तैयारी से लगता है कि वह किसी भी तरह के गंभीर टकराव की स्थिति के लिए मजबूत है। संस्थान का कहना है, ‘चीन ने समय-समय पर सीमा पर भारत को परेशान किया है और दोनों पक्षों के बीच शांति स्थापित करने के समझौते का उल्लंघन किया है। भारत भी अब इस बात को समझ रहा है कि वह अकेले इस मुद्दे से जूझ रहा है जिसका कोई फायदा नहीं है।

अमेरिका कर चुका है मदद की पेशकश

इस पूरे मामले में चीन के खिलाफ भारत को अपने साथ लेने की अमेरिका की कोशिश पर EFSAS ने यह भी कहा है कि जुलाई की शुरुआत में व्हाइट हाउस के चीफ ऑफ स्टाफ मार्क मेडोज ने कहा था कि अमेरिका भारत और चीन के बीच विवाद में मजबूती से खड़ा रहेगा और आरोप लगाया था कि चीन के आसपास कोई भी उसकी आक्रामकता से बचा नहीं है। अमेरिका की मदद की पेशकश के बावजूद भारत ने फैसला किया है कि वह अमेरिका या किसी दूसरे देश की मदद तब तक नहीं लेगा जब तक हालात इतने गंभीर न हो जाएं। QUAD देशों- जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ फिलहाल भारत चीन के खिलाफ कोई फ्रंट बनाने की ओर नहीं कदम बढ़ा रहा है

भारत न गठबंधन का हिस्सा था, होगा

EFSAS ने भारत के विदेश मंत्री के हवाले से लिखा है, ‘गठबंधन नहीं करना एक खास वक्त और भूगोलीय राजनीति के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाने वाला टर्म था। इसका एक पहलू स्वतंत्रता थी, जो हमारे लिए आज भी वाजिब है।’ हम कभी किसी बड़े गठबंधन का हिस्सा नहीं थे और कभी होंगे भी नहीं। EFSAS का कहना है कि अमेरिका को भारत के साथ खड़े रहने के आम आश्वासन से आगे बढ़कर यह साफ करना होगा कि वह चीन के खिलाफ साथ देने को भारत को मनाने के लिए क्या ऑफर दे सकता है।

कुल मिलाकर भारत ने चीन को साफ कर दिया है कि वो दुनिया के दम पर नही बल्कि अपनी शक्ति के दम पर हर तरह की चीनी हिमाकत का जवाब दे सकता है। और उसका उदाहरण चीनी और भारतीय फौज में हुई झड़प में चीन देख भी चुका है। इसलिये चीन भारत के रुख को लेकर अब परेशान और दुविधा में है।


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