क्या सच में विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली गयी है??

2014 में जब से देश में चिर-प्रतीक्षित सत्ता परिवर्तन हुआ है, तब से एक ख़ास धड़े के द्वारा बार-बार, अलग-अलग प्रकार से ये बात फैलाई जा रही है कि भारत में विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है| संविधान द्वारा दिए गए एक मौलिक अधिकार का मौजूदा सरकार द्वारा हनन किया जा रहा है|

ऐसे में ये सवाल हमेशा उठता है, कि सच क्या है?

क्या वाकई देश में अब बोलने की आज़ादी नहीं रही? क्या सरकार का विरोध करने पर या सरकार की किसी योजना का विरोध करने पर आम नागरिकों, राजनेताओं, जन-प्रतिनिधियों, या मीडिया संस्थानों पर कोई रोक -टोक है?

आज सुबह सुबह अपने आप को पत्रकारिता का स्वयंभू संरक्षक बताने वाले एक मीडिया संस्थान का एक विडियो फेसबुक पर देखने पर खुद से ये सवाल किया, कि अगर देश में सच में विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली गयी होती, तो क्या कन्हैया कुमार जैसा एक छुटभैया नेता, जिसके पास उपलब्धि के नाम पर JNU की एक सीट के अलावा कुछ भी नहीं, जिसे उसके खुद के जिले की जनता ने समस्त विपक्षी पार्टियों के समर्थन के वावजूद भी चुनाव में नकार दिया, वो देश के गृह मंत्री के खिलाफ ऐसे सारे-आम ज़हर उगल रहा है; फिर भी उसे कोई डर नहीं है|

इसी विडियो में अपनी माँ की सिर्फ तीन हज़ार की आमदनी का रोना रो रहे कन्हैया कुमार, खुद बिना किसी नौकरी और आमदनी के वावजूद चमड़े के जैकेट में सर्दी को मात देते देखे जा रहे हैं, और वो 130 करोड़ की आबादी वाले दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पूर्ण बहुमत से चुनी गयी सरकार के प्रधानमंत्री के चश्मे पर सवाल उठा रहे हैं|

क्या इस से ज्यादा विचार और अभिव्यक्ति की आज़ादी भी हो सकती है किसी देश में?

अपने इसी भाषण में कन्हैया कुमार ने JNU कि बिना भेदभाव वाली नीति का जिक्र किया, कि कैसे इस विश्वविद्यालय में सबको स्वीकार्यता मिलती है| चाहे आपका रंग किसी भी प्रकार का हो, आपके पास कैसे भी जूते हों, किसी भी ब्रांड का फ़ोन हो, कन्हैया कुमार ने Apple iPhone का भी जिक्र किया, और निचे इसी विडियो के स्क्रीनशॉट में उनके बगल में खड़े व्यक्ति को उसी iPhone से विडियो/ या फोटो लेता हुआ देखा जा सकता है|

कन्हैया कुमार द्वारा किये गए सबको स्वीकार्यता वाली बात की सच्चाई हर उस व्यक्ति को पता होगी जिसका JNU से थोडा बहुत भी सरोकार है| लेफ्टिस्ट विचारधारा को अपनाने वाले छात्रों में उनके अलावा दूसरी विचारधारा को मानने वाले लोगों के लिए कितनी स्वीकार्यता है, ये किसी को बताने की जरुरत नहीं है|

फिर भी सवाल वही है कि, क्या सच में विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली गयी है?