क्या आपको पता है छठी मइया आखिर किसकी बहन है?

उत्तर भारत में दिवाली त्योहार खत्म होने के बाद अब छठ पर्व की धूम साफ तौर पर देखी जा रही है। यही नही छठ महा पर्व की शुरुआत नहाए-खाए से शुरू भी हो गई है। भारतीय संस्कृति में छठ महा पर्व ही मात्र एक ऐसा पर्व है जिसमे उगते सूरज के साथ सात डूबते सूरज की पूजा की जाती है। चलिये इस पूजा से जुड़ी कुछ कथाएं आपको बताते है।

कौन हैं छठी मइया?

कार्तिक मास की षष्ठी को छठ मनाई जाती है। छठे दिन पूजी जाने वाली षष्ठी मइया को बिहार में आसान भाषा में छठी मइया कहकर पुकारते हैं। मान्यता है कि छठ पूजा के दौरान पूजी जाने वाली यह माता सूर्य भगवान की बहन हैं। इसीलिए लोग सूर्य को अर्घ्य देकर छठ मैया को प्रसन्न करते हैं। वहीं, पुराणों में मां दुर्गा के छठे रूप कात्यायनी देवी को भी छठ माता का ही रूप माना जाता है। छठ मइया को संतान देने वाली माता के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि जिन छठ पर्व संतान के लिए मनाया जाता है। खासकर वो जोड़े जिन्हें संतान का प्राप्ति नही हुई वो छठ का व्रत रखते हैं, बाकि सभी अपने बच्चों की सुख-शांति के लिए छठ मनाते हैं।

छठ पूजा में अर्घ्य देने का वैज्ञानिक महत्व

यह बात सभी को मालूम है कि सूरज की किरणों से शरीर को विटामिन डी मिलती है और उगते सूर्य की किरणों के फायदेमंद और कुछ भी नहीं। इसीलिए सदियों से सूर्य नमस्कार को बहुत लाभकारी बताया गया। वहीं, प्रिज्म के सिद्धांत के मुताबिक सुबह की सूरत की रोशनी से मिलने वाले विटामिन डी से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है और स्किन से जुड़ी सभी परेशानियां खत्म हो जाती हैं।

भगवान राम और सीता माता ने की थी छठ की पूजा

एक पौराणिक लोककथा के अनुसार, जब श्री राम ने लंकापति रावण पर विजय प्राप्त की थी। तब राम राज्य की स्थापना के बाद माता सीता और श्री राम ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उपवास किया था। साथ ही सूर्यदेव की आराधना की थी। फिर सप्तमी तिथि को सूर्योदय के समय दोनों ने दोबारा अनुष्ठान किया और सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया।

द्रौपदी ने भी रखा था छठ व्रत

एक पौराणिक लोककथा के अनुसार, जब श्री राम ने लंकापति रावण पर विजय प्राप्त की थी। तब राम राज्य की स्थापना के बाद माता सीता और श्री राम ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उपवास किया था साथ ही सूर्यदेव की आराधना की थी। फिर सप्तमी तिथि को सूर्योदय के समय दोनों ने दोबारा अनुष्ठान किया और सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया। इतना ही नही एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, इस व्रत की शुरुआत महाभारत के समय से हुई थी। उस समय सबसे पहले सूर्यदेव की पूजा सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी। कर्ण हर दिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे। सूर्यदेव की कृपा से ही वो एक महान योद्धा बने। तब से अब तक छठ पूजा के दौरान सूर्य को अर्घ्य की प्रथा चली आ रही है।

सूर्यदेव की भक्ति की सालो से चली आ रही ये परंपरा आज भी उतनी ही धूमधाम से मनाई जाती है जितनी की पहले हुआ करती थी हां ये जरूर है कि कुछ पूजा करने के तरीके जरूर बदले है लेकिन आस्था और अधिक बढ़ गई है।

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