क्या संघ सफल हुआ अपनी सोच बताने में?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस जिसकी स्थापना 72 सितंबर 1925 मे हुई थी और तब से ही संघ पर हिन्दूवादी और देश मे गंगा जमुना तहजीब को तोड़ने का आरोप भी लगता रहा है। आजादी के बाद तो संघ को किसी अछूत संगठन की तरह ही देखा गया लेकिन क्या स्थापना के 92 साल बाद संघ कि छवि अब बदल रही है। भारत के कल को लेकर जिस तरह की सोच संघ ने पेश की है उससे जरूर  उन लोगों की उसके प्रति सोच बदलनी चाहिए जो उसे बिना जाने-समझे एक खास खांचे में फिट करके संघ को देखते रहते हैं।

बदलाव की ओर संघ

एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में संघ किस तरह बदलते समय के साथ खुद को बदल रहा है, इसका एक प्रमाण तो यही है कि उसने अपने विरोधियों और आलोचकों को अपने ढंग के एक अनूठे कार्यक्रम में आमंत्रित किया। देश और शायद दुनिया के इस सबसे विशाल संगठन के नेतृत्व ने इन आमंत्रित लोगों के सवालों के जवाब भी दिए। बीजेपी विरोध की राजनीति करने वाले अधिकतर दलों के नेताओं ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीन दिवसीय कार्यक्रम का जिस तरह बहिष्कार करते हुए उसे सगर्व सार्वजनिक भी किया उससे यही स्पष्ट हुआ कि जब संघ खुद में बदलाव लाने की सामथ्र्य दिखा रहा तब उसके आलोचक और विरोधी जहां के तहां खड़े रहने में ही खुद की भलाई देख रहे हैं। वे इसके लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन समझदार तो वही होता है जो खुद को देश, काल और परिस्थितियों के हिसाब से बदलता है।

 

इसमे कोई शक नही की संघ को जानने-समझने का यह मतलब नहीं कि उसके साथ खड़े ही हुआ जाये। लेकिन इसका भी कोई मतलब नहीं कि उसकी नीतियों को समाज एवं राष्ट्रविरोधी करार देकर उसे अछूत संगठन की तरह से देखा जाए या फिर उसका हौवा खड़ा किया जाए।संघ प्रमुख मोहन भागवत ने राष्ट्रीयता, के साथ समाज एवं राष्ट्र निर्माण की आवश्यकता पर जिस तरह अपनी बात रखी इससे साफ होता है कि इस संगठन की दिलचस्पी राजनीति में कम और राष्ट्रनीति में अधिक है। इसीलिये संघ ने आजतक कोई भी चुनाव नही लड़ा और बगैर सत्ता के ही देश हित मे काम करते रहे। जिससे पता चलता है कि उन्होंने समाज निर्माण को अपना एक मात्र मकसद बनाया।

हिंदुत्व पर साफ किया रुख

इस क्रम में उन्होंने हिंदू और हिंदुत्व पर जोर देने के कारणों को भी बताया।  इससे संघ और हिंदुत्व को लेकर जो लगतफहमी फैली हुई थी वो भी साफ होते हुए दिखाई दी लेकिन यह भी स्पष्ट है कि अभी भी कुछ भ्रांतियां और संदेह बरकरार है जिन्हे संघ को दूर करने होगें। मसलन  गौ रक्षा ऐसे कई मुद्दे है जिसपर अभी भी संघ के विरोधी तंज कस सकते है। फिर भी कही न कही अब संघ को समझने के लिये लोग दिलचस्पी ले रहे है।

तभी तो संघ के धुर विरोधी कहे जाने वाले कांग्रेस के दिग्गज नेता और देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणव दा खुद संघ के दफ्तर गये और संघ को समझने की कोशिश की। इसी तरह संघ के कई विरोधी इस आयोजन मे भी आये और संघ को जानने और परखने का मन बनाया। फिलहाल संघ की ये एक बड़ी जीत है कि आज संघ को समझने वालो की सख्या बढ़ रही है। ऐसे मे संघ को इस तरह के कार्यक्रम करते रहना चाहिये क्योंकि इससे कही न कही जो संघ के साख पर बट्टा लगा है वो खत्म होगा साथ ही साथ संघ ही विचारधार से लोग अवगत भी होगे।