सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बनना तय, बढ़ेगा भारत का दुनिया में दबदबा

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महज 6 साल के भीतर मोदी सरकार के कामकाज के चलते विश्व में भारत की  धमक दिखने लगी है। अब विश्व भारत को सिर्फ सुनता नही है बल्कि भारत के बताये रास्तों पर चलने के लिए तैयार भी होता है। जिसके चलते विश्व के देश भारत को दुनिया संभालने के लिए जिम्मेदारी देते जा रही है। WHO में भारत को  एक्जीक्यूटिव बोर्ड के चेयरमैन का पद दिया गया तो अब जल्द ही भारत को सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य भी चुना जायेगा। वैसे तो इसका चुनाव 17 जून को है लेकिन इसमें भारत की जीत पक्की मानी जा रही है क्योंकि पहले ही 55 देश भारत के साथ खड़े हैं। इस बाबत भारत ने दुनिया के सामने अपना विजन भी रखा।

दुनिया को सवारने का भारत का विजन

सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बनने से पहले भारत के विदेश मंत्री ने एक विजन को भी दुनिया के सामने पेश किया। भारत का ये विजन 5S पर बेस होगा, यानी सम्मान,संवाद,सुरक्षा, शांति, समृद्धि के वैश्विक लक्ष्यों को पूरा करेगा। वैसे भी भारत विश्व के सामने कई बार ये बोल चुका है कि वो इस समूचे संसार को अपना परिवार मानता है। इसकी भलाई के लिए लगातार वो काम करता है।

भारत सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बनेगा

हालांकि यह पहला मौका नहीं है, जब भारत सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बनेगा। इससे पहले भी हम सात बार सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य रह चुके हैं। सबसे पहले 1950-51 में और आखिरी बार 2011-12 में हम सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य थे। लेकिन यहां गौर करने वाली बात ये होगी कि इस बार हमारी सदस्यता पहले से अलग तरह की होगी। दरअसल भारत इस बार अपनी नई कद काठी के साथ सुरक्षा परिषद में प्रवेश करने जा रहा है। इसकी कई वजहें हैं। जी-7 में भारत का सामिल होना। दुनिया के इस सबसे ताकतवर संगठन के स्थायी सदस्य बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे होंगे। इसके साथ साथ विश्व के शक्तिशाली देशों के साथ कई ऐसे मुल्क हैं जो भारत को स्थाई सदस्य बनाने पर जोर दे रहे हैं। ऐसे  में भारत का ये पद संभालना पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में होना बताएगा।

वैश्विक राजनीति और कूटनीति का समीकरण

कोरोना संकट के बाद जिस तरह से दुनिया में देशों की दोस्ती के संबध बदल रहे हैं उससे साफ हो रहा है कि भारत के लिए ये भूमिका काफी अहम होने वाली है। चीन और अमेरिकी टकराव के बीच भारत कैसे अपना हित साधकर आगे बढ़ता है। उसका रोडमैप पीएम मोदी ने पहले ही तैयार कर लिया है, पीएम ने देश में महापैकेज का ऐलान करते वक्त ही साफ कर दिया था कि आत्मनिर्भर भारत बने बिना वो किसी भी मोर्चे में आगे नही बढ़ सकता है। इसलिए इसकी शुरूआत कर दी गई है तो दूसरी तरफ अमेरिका जिस तरह से कोरोना से प्रभावित हुआ है, उसके चलते अब वह अकेले अपने कंधों पर विश्व की एकल महाशक्ति होने का बोझ हमेशा उठाए नहीं रह सकता। उसे एक ऐसा विश्वसनीय दोस्त चाहिए जिसके कंधे का उसे सहारा मिल सके। अमेरिका को भारत इस मामले में बन रहे नए समीकरणों का सबसे विश्वस्त दोस्त लग रहा है। भारत हमेशा से इस वैश्विक दायित्व के लिए तैयार रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से निजी संबंधों की केमेस्ट्री तो अच्छी तरह से मिलती ही है, अमेरिका इस बात को भी गंभीरता से मान चुका है कि भविष्य की दुनिया की चुनौतियां भारत जैसे विशाल उपभोक्ता देश के बिना संभालना संभव नहीं है।

मतलब साफ है कि आने वाले दिन भारत के होने वाले है, क्योंकि भारत अब बदल चुका है और हरदिन नया इतिहास रच रहा है। जिसका कारण 135 करोड़ भारतीय तो हैं ही लेकिन मुख्य कारण सिर्फ मोदी जी हैं जिनकी सकरात्मक ऊर्चा ने देश का माहौल ही बदल कर रख दिया है।


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