कृषि सुधारों पर सस्ती सियासत का दौर दिख रहा दिल्ली की सीमा पर

 कृषि और किसानों के कल्याण के लिए लाए गए तीन नए कानूनों के विरोध में पंजाब और हरियाणा के कुछ किसानों का एक तरह से दिल्ली को घेरकर अपंग बना देना राजनीतिक दलों की स्वार्थ वाली सस्ती राजनीति के साथ ही कुछ समूहों की मनमानी का प्रत्यक्ष उदाहरण है।

किसान आंदोलन के नाम पर सस्ती सियासत

विरोध के अधिकार के नाम पर किसान आंदोलन के बहाने जो कुछ हो रहा है वो बहुत गलत है। दुर्भाग्य से यह सब राष्ट्रीय हितों की कीमत पर किया जा रहा है। ऐसी राजनीति देश का क्या भला करेगी जो न तो किसी तर्क से संचालित हो और न राष्ट्रहित पर केंद्रित हो, बल्कि सरकार और समाज का ध्यान भटकाने का काम करे? किसान आंदोलन को हवा दे रहे राजनीतिक दल हाशिये पर पहुंच जाने के बाद अब झूठ और दुष्प्रचार के आधार पर लोगों को बरगलाने का काम कर रहे हैं। उन्हें इसकी भी चिंता नहीं है कि इस आंदोलन के नाम पर जो सियासत की जा रही है वह देश को कमजोर करने का काम करेगी। मोदी सरकार में यह पहला अवसर नहीं है जब किसी मामले में दुष्प्रचार और गलत तथ्यों के आधार पर झूठा माहौल बनाने की कोशिश की गई हो और वह भी सिर्फ इसलिए कि विरोधी दल राजनीतिक रूप से पीएम मोदी का सामना नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे दल अपने अस्तित्व को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार नजर आ रहे हैं।

नए कानूनों को लेकर आढ़तियों ने किसानों को भड़काया

यह आश्चर्यजनक है कि जिन कानूनों को लगभग पूरे देश के किसान अपने लिए फायदेमंद मान रहे हैं उन्हें पंजाब और हरियाणा के किसानों का एक समूह अपने लिए संकट के रूप में देख रहा है। यह समूह वास्तव में उन आढ़तियों और बिचौलियों की ढाल बनने का काम कर रहा है जो अब तक अपनी जेबें भरते आए हैं। चूंकि आढ़तियों के संगठन यह महसूस कर रहे हैं कि नए कानूनों से उनका अपना धंधा समाप्त हो जाएगा इसलिए किसानों को भड़का दिया गया। पहले किसानों का विरोध केवल इस पर आधारित था कि एमएसपी को कानूनी स्वरूप दिया जाए और अब वे तीनों नए कानूनों की वापसी की मांग पर अड़ गए हैं। केंद्र के तीनों कानून किसानों को यह अवसर देते हैं कि वे अपनी उपज का उचित मूल्य हासिल करने के लिए उसे मंडी के बाहर भी बेच सकें, उनके पास फसलों की बिक्री के लिए अधिक विकल्प हों और वे बिचौलियों के जाल से मुक्त हों।

CAA  के बाद ये दूसरा आंदोलन देखने को मिल रहा है जिसका कोई सिर पैर नही है। खुद किसान जो धरने पर बैठे है वो किसान बिल को लेकर ज्यादा जागरूक नही है। ऐसे में अगर उन्हे ज्यादा जागरूक किया जाये तो ये साफ है कि वो भी किसान बिल के साथ खड़े दिखाई देंगे जिससे सियासी दलो की दुकान तो बंद होगी साथ ही बिचौलियों का खेल भी खत्म होगा बस इसी डर के चलते कुछ लोग अपने हितो के लिए किसानो को मोहरा बनाये हुए है।