दिल्ली विधानसभा चुनाव – कांग्रेस मुक्त होता भारत का एक और उदाहरण है

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केजरीवाल ने दिल्ली में कांग्रेस का राजनैतिक रूप से अंतिम संस्कार कर दिया है। दिल्ली में 15 साल तक राज करने वाली कांग्रेस विधानसभा चुनाव में पूरी तरह से साफ हो गई है और पिछले चुनाव की तरह इस बार भी खाता नहीं खोल पाई। एक के बाद एक लगातार मिल रही हार से ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या कांग्रेस का जनाधार खत्म हो चुका है?

दिल्ली विधानसभा चुनाव में एक बार फिर न सिर्फ कांग्रेस पार्टी का सूपड़ा साफ हुआ है, बल्कि 70 में से इसके 67 उम्मीदवारों की जमानत भी जब्त हो गई है। दिल्ली चुनाव के रुझानों में कांग्रेस के वोट शेयर में जबरदस्त गिरावट देखने को मिल रहा है, जहां पार्टी को 2015 चुनाव के मुकाबले कम वोट हासिल हुआ है। कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि अगर कांग्रेस मजबूत स्थिति में होती तो भाजपा को अभी के मुकाबले और ज्यादा सीटें हासिल होती।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष् सुभाष चोपड़ा सहित कांग्रेस के सभी बड़े नेता हार चुके है और ज्यादातर प्रत्याशी अपनी जमानत भी नहीं बचा सके हैं। सुभाष चोपड़ा की बेटी शिवानी चोपड़ा कालकाजी से बुरी तरह परास्त हुई है। प्रचार समिति के अध्यक्ष कीर्ति आजाद की पत्नी पूनम आजाद संगम विहार से हार गईं। मुख्य प्रवक्ता मुकेश शर्मा की जमानत जब्त हो गई। पूर्व सांसद परवेज हाशमी, पूर्व केंद्रीय मंत्री कृष्णा तीरथ, पूर्व मंत्री अरविंदर सिंह लवली, हारून यूसुफ, डा. नरेंद्र नाथ, पूर्व कददावर विधायक चौ. मतीन अहमद, जयकिशन, देवेंद्र यादव, सौमेश शौकीन सहित पार्टी के सभी उम्मीदवार पराजित हो गए।

इतना शर्मनाक प्रदर्शन कांग्रेस पार्टी का शायद ही कभी रहा है। लेकिन इस पर मंथन करने के बजाए, अपने गिरेबां में झांकने के बदले कांग्रेस पार्टी के बड़े-बड़े नेता खुशी मना रहे हैं। 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट फीसद नौ था जोकि इस बार घटकर चार से पांच फीसद रह गया है। पार्टी का पूरा जनाधार ही लौटने के बजाए आम आदमी पार्टी को चला गया है। इसके बाबजूद बीजेपी के सत्ता में नहीं आने भर से कांग्रेसी खुश है।

क्या वंशवाद की राजनीति के कारण कांग्रेस अपनी जड़ों से दूर होती जा रही है? क्या मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के कारण ने कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक ध्वस्त हो चुका है? लोकसभा चुनाव में हार के बाद भले ही आज कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व सोनिया गांधी के हाथ में है, लेकिन पार्टी की अगुवाई राहुल गांधी ही कर रहे हैं। लगातार मिल रही हार से साफ है कि जिस राहुल गांधी के भरोसे पार्टी देश में फिर से पैर जमाने की कोशिश कर रही है वह बेहद कमजोर है और उनके नेतृत्व में पार्टी कांग्रेस मुक्त भारत की ओर अग्रसर है।

2019 लोकसभा चुनाव में 52 सीटों पर सिमट गई कांग्रेस

मतदाताओं का कांग्रेस से विश्वास उठ चला रहा है। कांग्रेस लोकसभा में नेता विपक्ष बनने लायक पार्टी भी नहीं बची है। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को सिर्फ 52 सीटों पर संतोष करना पड़ा। आज पार्टी की हालत ये हो गई है कि पुराने नेता भी किनारा करने लगे हैं। लगातार मिल रही हार के बाद अब तो पार्टी की अस्मिता पर सवाल उठने लगा है। जहां भाजपा का विस्तार होते-होते करीब 20 राज्यों सरकारें बन गईं वहीं कांग्रेस सिर्फ 5 राज्यों तक सिमट कर रह गई है।

 


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