अंदुरूनी कलह से झूझती दशको पुरानी कांग्रेस पार्टी

भारत के राजनैतिक इतिहास में सबसे लबे समय तक सत्ता का सुख भोगने वाली पार्टी महज 7 साल सत्ता से दूर क्या हुई पार्टी के भीतर ऐसी आग लगी कि अब उसे बुझाये नहीं बुझाया जा पा रहा है। पार्टी के भीतर एक मामला शांत होता है तो दूसरा मामला सामने आने लगता है और ऐसा इस लिये हो रहा है क्योकि आज पार्टी कुछ लोगों द्वारा कुछ लोगों की खुशामद करने से चल रही है और यही वजह है कि पार्टी में आपसी कलह बढ़ रही है।

चापलूसी का स्तर बढ़ने से पार्टी खत्म होने के मुहाने पर

वैसे तो खुद महात्मा गांधी कांग्रेस पार्टी को खत्म करने की बात करते थे लेकिन लगता यही है कि उनका सपना देश की आजादी के 75वें साल तक पूरा हो सकता है क्योंकि आज जिस स्थिति में पार्टी पहुंच चुकी है उससे तो कयास यही लगाया जा सकता है कि पार्टी खत्म होने के बहुत करीब है। हर नेता आज पार्टी का दूसरे नेता पर तंज कसता हुआ दिखाई दे रहा है। राज्य के नेता केंद्र के नेताओं की नहीं सुन रहे है तो कुछ अपनी गलतबयानबाजी से दूसरे दलों को पार्टीपर हमला करने का मौका दे रहे है। हां, कुछ नेता पार्टी को बचाने के लिये पार्टी के भीतर ही संघर्ष करते हुए दिखाई दे रहे है तो उनपर पार्टी के चापलूस भारी पड़ रहे है। पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र खत्म सा दिख रहा है और यही वजह है कि आज कांग्रेस हासिये पर जा रही है।

अपने क्षत्रपों को अपमानित करने का कांग्रेस का पुराना इतिहास

और ये पहला मौका नहीं जब अमरिंदर जैसे कद्दावर नेता को पार्टी के प्रथम परिवार के समक्ष ही सत्ता गंवानी पड़ी। इससे पहले दो उदाहरण तत्काल जेहन में आते हैं। जब राजीव गांधी पार्टी महासचिव थे तो उन्होंने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे टी अंजैया को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया। फिर प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के रूप में उन्होंने यही सुलूक कर्नाटक के मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल को हटाकर किया। हालांकि इससे पार्टी का नुकसान तो हुआ लेकिन फिर भी पार्टी संभल गई। पर आज जिस तरह के माहौल बने है वो बिल्कुल अलग है क्योंकि आज केंद्रिय नेतृत्व में भी वो दम नही दिख रहा है जो पहले हुआ करता था इसलिये क्षेत्रिय नेता खुलकर पार्टी के खिलाफ बोल रहे है। दूसरी तरफ ये भी बोल सकते है कि पार्टी में आज वो नेता ज्यादा शक्तिशाली हो चुके है जो सिर्फ चापलूसी कर रहे है जबकि जनाधार वाले नेता पार्टी में हासिये पर पहुंच रहे है और इन दोनो की जंग एक परिवार समझ नहीं पा रहा है।

वैसे भी आज गांधी परिवार देश की जनता को लुभाने में सफल नहीं हो पा रही है और जिन नेताओं का जनाधार जनता में है उसे पार्टी में बैकफुट पर बैठाकर दशको पुरानी पार्टी को कमजोर करती जा रही है। ऐसे में हालात जब तक नही सुधरेगे जब तक पार्टी के बारे में पूरी ईमानदारी के साथ नहीं सोचा जाता है।