दो वक़्त की रोटी और किडनी की बीमारी से जूझ रहे कश्मीरी परिवार को सीआरपीएफ का सहारा

CRPF support to Kashmiri family

घाटी में फैले आतंक से न जाने कितने घर बर्बाद हुए, कितने ही भटके हुए युवाओं ने अपनी जान गँवाई, कितने ही घर वीरान हुए| लेकिन जो जिंदगियां जीते जी हर रोज मरने पर मजबूर हैं, उन्हें देखने वाला और उनकी बात करने वाला भी कोई नहीं| ऐसे में भारतीय सेना और अर्धसैनिक बल ही जीवनदाता का जिम्मा भी उठाते हैं|

दो बच्चों और बीवी संग मेहनत-मजदूरी कर के अपना जीवन यापन करने वाला अब्दुल कयूम का परिवार भी ऐसे ही कई परिवारों में से एक है, जिनकी जिंदगियां दहशतगर्दी के बाद वीरान घाटी में दफ़न होकर रह गयी थी|

कुछ महीने पहले ऐसा समय आ गया जब अब्दुल कयूम का पूरा परिवार दो वक़्त की रोटी के लिए भी तरस गया था| मजदूरी कर के अपना और अपने परिवार का पेट पालने वाले अब्दुल कयूम को किडनी की बीमारी हो गयी और वो मजदूरी करने लायक भी नहीं बचा| ऐसे में कुछ वक़्त तो परिवार ने घर का सामान बेचकर निकाला और कुछ रिश्तेदारों के रहम-ओ-करम, लेकिन बदलते समय के साथ दोस्तों और रिश्तेदारों ने भी मुँह मोड़ लिया|

जब पेट की आग बुझाना भी दूभर हो गया तब अब्दुल कयूम मदद की आस में सीआरपीएफ की मददगार यूनिट के पास पहुंचे| सीआरपीएफ के अधिकारियों ने उन्हें हर संभव सहायता का वादा किया, और अपने अस्पताल में अब्दुल कयूम का मेडिकल चेकअप करवा कर आवश्यक दवा-दारु का भी प्रबंध किया|

इतना ही नहीं, बीमारी की हालत में इलाज के वावजूद अब्दुल कयूम इस हालत में नहीं थे की वो अपने परिवार के लिए फिर से मेहनत मजदूरी कर सके| इसलिए सीआरपीएफ ने एक एनजीओ की मदद से कयूम की पत्नी को सिलाई का प्रशिक्षण दिलवाया और एक सिलाई मशीन उपलब्ध करवाई| साथ ही सतत आमदनी के लिए लोकल टेलर और कुछ अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से निरंतर सिलाई के काम का भी इंतजाम किया|

भला हो सीआरपीएफ की मददगार यूनिट का जिसने एक परिवार को दर दर भटकने से बचा लिया और एक सम्मानजनक जीवन जीने में योगदान दिया| यह इस बात की और इशारा करता है कि, जब तक घाटी के हालात पूरी तरह नहीं सुधरते, तब तक सेना और अर्धसैनिक बल हर प्रकार से आवाम की सहायता करने को कृतसंकल्प हैं|