कोर्ट ने दिया अधिकार समाज में बढ़ा महिलाओं का सम्मान

भारत वो देश है जहां नारी को दुर्गा के रूप में पूजने की परंपरा है। युगों से हम नारी को पुरूष से पहले अधिकार देते आये है लेकिन कुछ दशक पहले नारी शक्ति देश में धुमिल हो रही थी लेकिन पिछले दो-तीन दशक से सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे अहम फैसले दिए हैं, जिनसे महिलाओं को ज्यादा अधिकार मिले हैं। ये अधिकार उन्हें आर्थिक और सामाजिक तौर पर ज्यादा मजबूत बनाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के ऐसे फैसलों से महिलाएं न सिर्फ मायके में बल्कि ससुराल में भी ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रही हैं। चलिये महिला दिवस पर कुछ ऐसे ही अधिकार के बारे में हम जानते है जो महिलाओं को मजबूत और अधिक शक्ति शाली बनाते है.

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बेटी का अब पिता की जायदाद पर होता पूरा

11 अगस्त 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसले में कहा है कि बेटी को पैतृक संपत्ति में बेटे के बराबर का अधिकार है और हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 के वक्त चाहे बेटी के पिता जिंदा रहे हों या नहीं, बेटी को हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली में बेटे के बराबर संपत्ति में अधिकार मिलेगा।बेटी को पैदा होते ही जीवनभर बेटे के बराबर का अधिकार मिलेगा। इसके लिए हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 में बदलाव किया गया वरना इससे पहले बेटियों को शादी के बाद पिता की जायदाद में कोई हक नही होता था। लेकिन अब ऐसा नही है। इसका असर भी देखने को मिला जिसके चलते महिलाओं को पिता के घर में सम्मान भी मिला है।

 

बहू को ससुराल में रहने का मिला अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2020 को एक अहम फैसला दिया जिसमें बहू को ससुराल में रहने का अधिकार दिया गया है। दरअसल, डोमेस्टिक वॉयलेंस (डीवी) ऐक्ट के तहत दिए गए प्रावधान की सुप्रीम कोर्ट ने व्याख्या की और कहा कि बहू अगर घर में रह चुकी है या रह रही है तो उसे वहां डोमेस्टिक वॉयलेंस के तहत रहने का अधिकार है। सास-ससुर अगर डोमेस्टिक रिलेशनशिप में हैं तो बहू साझे मकान में रह सकती है। इस अधिकार से मिलने से अब बहुओं पर उत्पीडन कम हुआ है तो दूसरी तरफ महिलाओं को समाजिक मजबूती भी मिली है।

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ससुराल में प्रताड़ना का केस मायके में दर्ज

सुप्रीम कोर्ट ने 9 अप्रैल 2019 को बेहद अहम फैसले में कहा, अगर ससुराल में पत्नी को पति या दूसरे लोगों ने दहेज के लिए परेशान किया है तो महिला ससुराल छोड़कर जहां जाकर रहती है या पनाह लेती है, वहां की अदालत में भी उसकी शिकायत पर सुनवाई होगी। कोर्ट के इस फैसले के बाद उन महिलाओं को बल मिला जो सिर्फ कोर्ट में अपने पति पर सिर्फ इस लिये मुकदमा नही कर पाती थी क्योकि वो उस शहर में नही रहती थी लेकिन कोर्ट के इस फैसले से उन्हे न्याय मिलने में अब दिक्कत नही आती है।

महिलाओं को वाजिब गुजारा भत्ता मिलने में आसानी

सुप्रीम कोर्ट ने 4 नवंबर 2020 को गुजारा भत्ता और ऐलमोनी (निर्वाह भत्ता) की खातिर देश भर की अदालतों के लिए गाइडलाइंस तय कीं। सुप्रीम कोर्ट ने इसके तहत तमाम ऐसे निर्देश जारी किए हैं जिससे गुजारा भत्ते के मामले में पारदर्शिता आ सके। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा,अगर महिला गुजारा भत्ते के लिए अर्जी दाखिल करे तो उसे बताना होगा कि उसके पास कितनी संपत्ति है और उसका खर्च क्या है।महिला को यह भी बताना होगा कि क्या पहले के मामले में उसे कोई मुआवजा मिला है?वहीं पति को जवाब में अपनी संपत्ति का ब्यौरा और देनदारी बतानी होगी। अगर कोई जानकारी गलत दी गई तो शपथ लेकर झूठ बोलने के मामले में पक्षकार पर मुकदमा चलेगा, साथ ही कोर्ट की अवमानना का मामला भी बनेगा। पहले से मिले गुजारा भत्ते को बाद के दावे में एडजस्ट किया जाएगा।जिस दिन से मुकदमा दायर किया जाएगा उसी दिन से गुजारा भत्ते की देनदारी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जिला अदालतों और फैमिली कोर्ट के लिए गाइडलाइंस जारी की हैं कि किस तरह से गुजारा भत्ते के लिए अप्लाई करना होगा और कैसे मुआवजे की रकम का भुगतान होगा।

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फटाफट तीन तलाक से मिला छुटकारा

सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में एक बार में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि तीन तलाक अवैध, गैर-संवैधानिक और अमान्य है। तीन तलाक कुरान की रीति के खिलाफ है। इस फैसले के बाद केंद्र सरकार ने कानून बनाया। 30 जुलाई 2019 को केंद्र सरकार ने मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 बनाया था। एक बार में तीन तलाक को अपराध के दायरे में लाते हुए ऐसा करने वाले को तीन साल तक कैद की सजा देने का प्रावधान किया गया है। इसके तहत ये प्रावधान किए गए हैंएक बार में तीन तलाक देने वाले पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जा सकती है। इस मामले में एफआईआर तभी मंजूर की जाएगी जब शिकायती खुद पीड़ित महिला हो या फिर उनके ब्लड रिलेशन वाले लोग यानी बेहद करीबी रिश्तेदार।एफआईआर के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए शिकायती तय किए गए हैं।पति और पत्नी के बीच मैजिस्ट्रेट की कोर्ट में समझौता भी हो सकता है। यह गैर-जमानती अपराध बना रहेगा, लेकिन अब इसमें ऐसी व्यवस्था कर दी गई है कि मैजिस्ट्रेट की अदालत से जमानत हो सकती है।महिलाओं को यह अधिकार भी दिया गया है कि वे तीन तलाक की स्थिति में खुद या अपने बच्चों के लिए भरण-पोषण की मांग करने के लिए कोर्ट या मैजिस्ट्रेट की अदालत का दरवाजा खटखटा सकती हैं।

कोर्ट के जरिये महिलाओं को मिले इस अधिकारों की वजह से आज महिलाए सामाजिक, आर्थिक रूप से उन्हे मजबूती मिल कही है जिससे आज वो स्वाभिमान के साथ जी पा रही है।