नये सवेरे के साथ नागरिकता संशोधन बिल लोकसभा से पास

एक कहावत है कि भगवान के घर देर है,अंधेर नही। अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए गैर मुस्लिम शरणार्थी शायद हर दिन यही सोचकर अपना जीवन बिता रहे थे कि कब कोई सूरज निकलेगा औऱ उनके जीवन का अंधियारा दूर होगा। आखिर 12 घंटे की तीखी बहस के बाद रात 12 बजे नागरिक संशोधन बिल पर देश के लोकतंत्र के मंदिर मतलब लोकसभा में मोहर लगने के साथ एक नई सुबह तो हुई है, उन प्रवासियों की उम्मीदों को भी पंख लग गये जो नाउम्मीदी में जी रहे थे। लोकसभा में इसके पक्ष में 311 वोट पड़े तो विपक्ष में 80 वोट डाले गये। मजे की बात तो ये है कि इस बिल के साथ JDU और शिवसेना भी साथ खड़ी दिखी। लेकिन आप सोच रहे होगे, जिस बिल को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष में 12 घंटे की गर्मागर्म बहस हुई, आखिर वो बिल है क्या?

क्या है नागरिकता संशोधन बिल?

नागरिकता संशोधन बिल में नागरिकता कानून, 1955 में संशोधन का प्रस्ताव है। इसमें अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए गैर मुस्लिम जैसे हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्मों के शरणार्थियों के लिए नागरिकता के नियमों को आसान बनाना है। मौजूदा समय में किसी व्यक्ति को भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए कम से कम पिछले 11 साल से यहां रहना अनिवार्य है। इस नियम को आसान बनाकर नागरिकता हासिल करने की अवधि को एक साल से लेकर 6 साल करना है यानी इन तीनों देशों के छह धर्मों के बीते एक से छह सालों में भारत आकर बसे लोगों को नागरिकता मिल सकेगी। आसान शब्दों में कहा जाए, तो भारत के तीन पड़ोसी मुस्लिम बहुसंख्यक देशों से आए गैर मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने के नियम को सरल करने का ये बिल है।

ये तो रहा इस बिल का खाका लेकिन देशवासियों के सामने ये सवाल ये खड़ा होता है कि आखिर देश में शरणार्थी और घुसपैठियों में क्या फर्क है बिना इसके जाने आप इस बिल के होने वाले लाभ को नही समझ सकते है।

शऱणार्थी बनाम घुसपैठियें – सबसे पहले बात करते है शऱणार्थियों की जो भारत से सटे मुस्लिम देशों से भारत आये है और वो भारत सिर्फ इस लिये आये है क्योकि उनके साथ धर्म के आधार पर वहां पर जुर्म किये जा रहे थे जिसके चलते उन्हे भारत आना पड़ा। दूसरी तरफ घुसपैठिया वो हो गये जो कुछ खास योजना के चलते भारत की सीमा में आ जाते है। फिर भारत के भीतर अपराधिक कारनामे करके देश का माहौल बिगाड़ते है। अब आप इससे समझ गये होगे कि ये बिल जब शरणार्थी के लिये है तो इससे देश को कोई नुक्सान कैसे हो सकता है।

चलिये अब जान लेते है कि अवैध प्रवासी को लेकर क्या प्रवधान भारत की संसद ने बनाये है।

अवैध प्रवासियों के लिए क्या हैं प्रावधान?

अवैध प्रवासियों को या तो जेल में रखा जा सकता है, या फिर विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट, भारत में प्रवेश अधिनियम, 1920 के तहत वापस उनके देश भेजा जा सकता है। लेकिन केंद्र सरकार ने साल 2015 और 2016 में उपरोक्त 1946 और 1920 के कानूनों में संशोधन करके अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और इसाई को छूट दे दी है। इसका मतलब यह हुआ कि इन धर्मों से संबंध रखने वाले लोग अगर भारत में वैध दस्तावेजों के बगैर भी रहते हैं तो उनको न तो जेल में डाला जा सकता है और न उनको निर्वासित किया जा सकता है। यह छूट उपरोक्त धार्मिक समूह के उनलोगों को प्राप्त है जो 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत पहुंचे हैं। इन्हीं धार्मिक समूहों से संबंध रखने वाले लोगों को भारत की नागरिकता का पात्र बनाने के लिए नागरिकता कानून-1955 में संशोधन के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक-2016 संसद में पेश किया गया था।

मतलब साफ है कि सरकार का ये बिल उन लोगों के लिये वरदान से कम नही है जो मुस्लिम मुल्क से सताये हुए थे और भारत इस आश से आये थे कि ये हमारा मुल्क है और यहां पर हम अपने बच्चों का भविष्य सवार सकते है। लेकिन देश कि सियासत के चलते ये लोग या तो देश में कही खो गये या वोटबैंक बनकर रह गये या कुछ के ऊपर अपराधियों का मेडल मिल गया। लेकिन कहते है अब इनके दिन बदल गये है, आने वाले दिनों में इनके बच्चे भी शान से भारत माता की जय का नारा बुलंद करेंगे और देश के विकास में योगदान में शामिल होंगे।