मसूद के मसले पर वीटो का उपयोग कर खुद फँस गया चीन

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वैसे लोग जो मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव का चीन द्वारा अडंगा लगा के गिरा दिए जाने के बाद प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को कोस रहे थे| उनके लिए यह खबर कतई अच्छी नहीं है| अब इस मसले पर खुद चीन के ही स्वर बदल गए हैं| दरअसल, भारत सरकार के कूटनीतिक कदम से चीन पूरी तरह दबाव में है, और समूचे विश्व में अलग-थलग पड़ गया है|

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चीन के बदले स्वर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत में चीन के राजदूत लुओ झाओहुई ने इस मसले पर बयान दिया है कि मसूद अजहर से जुड़ा मसला बातचीत के जरिये जल्द हल कर लिया जाएगा।

गौरतलब है की इससे पहले मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव का चीन ने वीटो का उपयोग कर विरोध किया था| नतीजतन मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने का प्रस्ताव उस वक़्त यूएन में गिर गया था| लेकिन चीन के बदले स्वर से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि चीन को इस बात का आभास ही नहीं था कि जब वो इसे प्रस्ताव का विरोध करेगा तो उसके खिलाफ कैसी स्थितियां पनपेगी|

उधर चीन द्वारा प्रस्ताव का विरोध करने के तुरंत बाद ही फ्रांस ने ऐलान कर दिया कि वह मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी मानकर जैश व मसूद की संपत्ति को जब्त करेगा। इतना ही नहीं, फ्रांस के गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि फ्रांस मसूद को यूरोपीय संघ की आतंकी सूची में शामिल करने को लेकर बात करेगा। अब यूरोपीय संघ में इसकी प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। दरअसल, यूरोपीय संघ की आतंकी सूची में मसूद के शामिल होने का मतलब होता है प्रमुख देशों के सबसे बड़े समूह द्वारा मसूद को आतंकी घोषित कर दिया जाना|

वीटो का उपयोग कर चीन ने खुद अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मार ली है

जब से चीन ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है, तभी से वो लगभग सभी मुख्य देशो के निशाने पर है| इसी बीच इस मुद्दे पर अमेरिका ने कहा है कि यदि चीन इसी तरह अड़ंगा लगाता रहा तो सदस्य देशों को दूसरे विकल्प पर ध्यान देना पड़ेगा। चूँकि संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध समिति में होने वाला विचार-विमर्श गोपनीय होता है और इसलिए सदस्य देश सार्वजनिक रूप से इस पर टिप्पणी नहीं कर सकते।

उधर यूएन के सदस्य देशो में भी चीन के इस एक्शन के खिलाफ गुस्सा है| जिसमे से कई सदस्य देशो के राजनयिकों ने मीडिया के सामने खुलकर इजहार भी किया है| इसी वाकये का जिक्र करते हुए सुरक्षा परिषद के एक राजनयिक ने चीन को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वह इस कार्य में बाधा पैदा करना जारी रखता है तो जिम्मेदार सदस्य देश, सुरक्षा परिषद में अन्य कदम उठाने पर मजबूर हो सकते हैं| दरअसल, आतंकवाद के मसले पर यूएन के ज्यादातर सदस्य देश एकमत है और आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेकने को प्रतिबद्ध हैं| ऐसे में चीन को खुद के अलग-थलग पड़ने का डर सता रहा है|

गौर करने वाली बात यह भी है कि इस बार सुरक्षा परिषद में भारत ने नहीं, बल्कि फ्रांस की अगुवाई में ब्रिटेन और अमेरिका ने मिलकर प्रस्ताव पेश किया था। तो ऐसे में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के पांच में से तीन स्थायी सदस्यों का मिलकर प्रस्ताव लाना, भारत की बढ़ती विश्वसनीयता, मजबूत नेतृत्व, और सफल विदेश नीति का ही परिचायक है|