Lockdown बढ़ते गया, और बदलाव का एक कारवां बनते गया…

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कोरोना महामारी का खेल बड़ा विचित्र रहा है। जो ना सोचा था वो होते गया, लॉकडाउन बढ़ते गया और कारवां बनते गया। आधुनिकता और औद्योगीकरण के इस युग में एक झटके में सबकुछ पीछे हो गया। परिवर्तनों की होड़ लग गई। परिस्थितियाँ वो बनीं जो अविश्वसनीय और अकल्पनीय थीं। सोच बदलने लगे, व्यवहार बदलने लगा, रिश्तों के मतलब बदलने लगे, व्यापार बदलने लगे, लोगों के अधिकार बदलने लगे, छवि बदलने लगी, भविष्य बदलने लगा, शिक्षा बदलने लगे, भाव बदलने लगे, चुटकुले बदलने लगे, मजाक बदलने लगे और ना जाने इन कुछ दिनों में कितने बदलाव के हम साथी बन गए।

 

कुछ बदलाव हम क्रमबद्ध करते हैं और उम्मीद करते हैं कि उस बदलाव को आप अपने और अपने आसपास जरूर महसूस कर रहे होंगे:

 

विदेश जाना अब आपका इज्जत नहीं बढ़ाएगा: विदेश जाना, विदेश में पढ़ना या विदेश में नौकरी करना एक स्टैटस सिम्बल बन गया था। इस महामारी ने इस सोच को बदल दिया। लोग अपने देश की तरफ वापस लौटने लगे। भारत ने जिस तरह से इस महामारी को अब तक रोक रखा है, उसने प्रवासी भारतीयों के दिल में एक उम्मीद बँधाया है। मतलब कि अगर अब आपने अपने पड़ोसी ये रिश्तेदारों से सीना चौड़ा कर के कहा कि मेरा बेटा विदेश में रहता है तो उसका उल्टा असर पड़ सकता है।    

 

पुलिस का मानवीय रूप: इस महामारी ने पुलिस की छवि बदल कर रख दी है। शायद यह पहली बार है कि पुलिस को बर्बरता के लिए नहीं बल्कि मानवीय संवेदना के लिए याद किया जा रहा है।  

 

झूठी शान शौकत: बहुत बड़ा ब्रेक लग गया है झूठी शान शौकत पे। खास और आम लगभग सब बराबर हो गए हैं। दिखाने के लिए बहुत कुछ बचा नहीं है।  

 

घर में रहिए: परिवार की यह शिकायत दूर हो गई है कि घर मे रहते ही नहीं। कोरोना ने कहा कि घर में रहिए।  

 

बाजार मतलब ई-मार्केट: जिस शोरूम से कपड़े खरीदते थे उनका मैसेज आ रहा है कि अब आप ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं। मतलब बाजार का मतलब बदल गया है।

 

डिजिटल शिक्षा और सैटेलाइट शिक्षा: सरकार ई-लर्निंग या डिजिटल शिक्षा की तरफ बढ़ रही है। हर क्लास के लिए अलग चैनल आने वाला है।

 

प्रकृति में बदलाव: आधुनिकता के दौड़ में हम इतना आगे बढ़ गए थे कि पर्यावरण को भूल गए थे। लेकिन इस लॉकडाउन ने कुछ अच्छी खबरों का एक छोटा सा कारवां बना दिया। आजकल आम बात हो गई है जब अखबारों में पर्यावरण से जुड़े पॉजिटिव खबरें आ रही हैं। कभी लुधियाना से हिमाचल की पहाड़ी दिखने की खबर, काभी झांसी, सहारनपुर से पहाड़ दिखने की खबर, काभी गंगा-यमुना के साफ होने की खबर तो कभी दिल्ली में स्वच्छ हवा की खबर।  

 

व्यवहार और रिश्तों का नया सीजन: इस समय उनको घर की याद बहुत आई जो लोग घर से दूर थे। कह सकते हैं कि परिवारों को जोड़ा। वर्षों बाद कई परिवार में देखा गया कि कई जनरेशन के लोग एक साथ बैठ कर रामायण और महाभारत देख रहे हैं। फोन और वीडियो के माध्यम से लोग पुराने दोस्त भी जुड़े।  

 

मजदूरों का पलायन अपने घर के लिए: कभी कमाने के लिए अपने घर से पलायन किया था, आज संघर्ष है अपने घर के लिए पलायन करने का। बहुत मजदूर जो घर पहुँच रहे हैं वो कह रहे हैं कि अब घर छोड़ के नहीं जाएंगे, अब जो करेंगे यही करेंगे। यह गाँव की तस्वीर बदल सकती है। बीच का दौर ऐसा था जब गाँव में खेती के लिए लोग नहीं मिल रहे थे।

 

अविश्वसनीय और अकल्पनीय: पूरा का पूरा दौर अपने आप में अविश्वसनीय और अकल्पनीय है। सोचा नहीं था कि दुनिया थम जाएगी। जहां हम ग्लोबल विलेज की तरफ बढ़ गए थे वहाँ अब फिर से देश और देश की आत्मनिर्भरता की बात होने लगी। एयरपोर्ट बंद हो गए, आना जाना रुक गया, होटल बंद हो गए, मार्केट बंद हो गए, अर्थव्यवस्था रुक सी गई। रोजगार खतरे में पड़ा, ना जाने कितनों की नौकरी गई, सैलरी रुक गई।  लेकिन यह अलौकिक बदलाव ना जाने भविष्य को किस रूप में ले जाएगा यह अभी सोच भी नहीं सकते। बहुत सारे ऐसे परिवर्तन होंगे जो हो सकता है भविष्य को नया रास्ता दिखाए। लेकिन वर्तमान तो बदलाव के जाल में जकड़ा हुआ है। उथल-पुथल है, लोग वर्तमान और भविष्य में भटक रहे हैं, उनमें एक अनजान सा डर है।

 


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