चौंसठ योगिनी मंदिर, जिसकी तर्ज पर बना है संसद भवन

भारत में अभी ऐसे कई प्रसिद्ध स्थल और आर्किटेक्ट की अद्भुत मिसाल है जिनकी जानकारी लोगों तक नहीं पहुँच पायी है| हम सब भारत के खूबूसरत संसद भवन को देख चुके हैं| लेकिन ऐसी ही हू-ब-हू भवन है मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में जिसे ‘चम्बल की संसद’ भवन के नाम से जाना जाता है|

हमारा संसद भवन ब्रिटिश वास्तुविद् सर एडविन लुटियंस की परिकल्पना माना जाता है| लेकिन, इसका मॉडल मुरैना जिले के मितावली में मौजूद चौसठ योगिनी शिव मंदिर से मेल खाता है| 9वीं सदी में प्रतिहार वंश के राजाओं द्वारा बनाए गए मंदिर में 101 खंभे कतारबद्ध हैं और 64 कमरों में एक-एक शिवलिंग है| मंदिर के मुख्य परिसर में भी एक बड़ा शिवलिंग स्थापित है|

माना जाता है कि हर कमरे में शिवलिंग के साथ देवी योगिनी की मूर्ति भी रही होगी, जिसके आधार पर इसका नाम चौसठ योगिनी मंदिर पड़ा| इकंतेश्वर महादेव के नाम से भी प्रतिष्ठित यह मंदिर कभी तांत्रिक अनुष्ठान के विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाता था| 6 एकड़ में फैले भवन में 12 दरवाजे और 27 फीट ऊंचे 144 खंभे कतारबद्ध हैं| इसका व्यास 560 फीट और घेरा 533 मीटर है. इसके निर्माण में 1927 में 83 लाख रुपए की राशि खर्च हुई थी| भारतीय पुरातत्व विभाग के मुताबिक़, इस मंदिर को नौवीं सदी में बनवाया गया था| कभी हर कमरे में भगवान शिव के साथ देवी योगिनी की मूर्तियां भी थीं, इसलिए इसे चौंसठ योगिनी शिवमंदिर भी कहा जाता है|

भारतीय लोकतंत्र के मंदिर अर्थात दिल्ली स्थित संसद की इमारत इसी मंदिर की हूबहू प्रतिकृति है| लोकतंत्र के महापर्व के रूप में चल रहे आमचुनाव में शरीक होने वाले इस क्षेत्र के तमाम उम्मीदवार संसद भवन पहुंचने की हसरत पूरी करने के लिये इस मंदिर की दहलीज पर भी मत्था टेकने आते हैं| मुरैना से भाजपा उम्मीदवार और केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर सहित तमाम अन्य नेता इस फेहरिस्त में शामिल हैं|

तोमर कहते हैं कि मुरैना के मितावली गांव में स्थित चौंसठ योगिनी मंदिर ही नहीं बल्कि यहां आसपास के इलाके में मौजूद ऐतिहासिक महत्व के अन्य विरासत स्थल, अभी भी दुनिया की नजरों से ओझल हैं. इन्हें विश्व पटल पर लाने के लिये इस इलाके को यूनेस्को विश्व विरासत सूची में लाने की योजना प्रस्तावित है| उन्होंने बताया कि पुरातत्व विभाग के भोपाल और दिल्ली क्षेत्र के पूर्व प्रमुख के. के. मोहम्मद की देखरेख में इन मंदिरों का 2005 में जीर्णोद्धार किया गया था| इस हकीकत को भी वह स्वीकार करते हैं कि मोहम्मद के सेवानिवृत्त होने के बाद यह काम अंजाम तक नहीं पहुंच पाया है|

चौंसठ योगिनी से प्रभावित है संसद भवन का डिजाइन

मोहम्मद का दावा है कि संसद भवन का डिजाइन चौंसठ योगिनी मंदिर से प्रभावित है| संसद भवन की दीवारों पर अंकित वैदिक मंत्र इस बात के प्रमाण हैं कि इसके वास्तुशिल्प में ब्रिटिश वास्तुकारों ने भारतीय भवन निर्माण कला का पूरा ध्यान रखा| मोहम्मद ने बताया कि मुरैना के चंबल क्षेत्र में छठी शताब्दी से 15 वीं शताब्दी तक गुर्जर प्रतिहार वंश के तमाम महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विरासत स्थल मौजूद हैं| इन्हें सहेजने का काम 2004 तक चला| इसके बाद उन्होंने मितावली, पढ़ावली और बटेसर को जोड़कर विश्व विरासत क्षेत्र (वर्ल्ड हेरिटेज जोन) बनाने की योजना को आगे बढ़ाया था|

200 मंदिरों का भव्य परिसर

ऐतिहासिक स्थलों के पुनरुद्धार और चंबल के डकैतों का पुनर्वास करते हुये इस क्षेत्र को वैश्विक पर्यटन मानचित्र में शुमार करने वाली इस योजना को अखिल भारतीय वीर गुर्जर महासभा के सहयोग से शुरु किया गया. उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में सबसे प्राचीन स्थल बटेसर है, जहां छह से नौवीं शताब्दी के बीच लगभग 200 मंदिरों का भव्य परिसर उत्खनन में मिलने के बाद, 2004 तक 80 मंदिरों का जीर्णोद्धार किया गया| इसके पास ही मौजूद गढ़ी पढ़ावली गांव में 10वीं शताब्दी के शिव मंदिर मिले| इनमें सिर्फ एक मंदिर का जीर्णोद्धार हो सका| मंदिर में मौजूद सैकड़ों कामुक भित्ति चित्रों के कारण इस मंदिर को ‘मिनी खजुराहो’ भी कहते हैं|

पढ़ावली के पास गुर्जर शासक देवपाल द्वारा निर्मित चौंसठ योगिनी मंदिर वस्तुत: तंत्र विद्या का शिक्षा केन्द्र था. इस वृत्ताकार इमारत में शिव जी के 64 मंदिर मौजूद हैं| इनमें तंत्र शास्त्र की 64 योगिनियों के साथ शिव की प्रतिमायें मौजूद हैं| अखिल भारतीय वीर गुर्जर महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुराग गुर्जर ने बताया कि पूरे क्षेत्र को विश्व विरासत क्षेत्र के रूप में विकसित करने की कार्ययोजना को प्रधानमंत्री कार्यालय से संस्कृति मंत्रालय को भेजा जा चुका है| अभी तक यह मंत्रालय के पास विचाराधीन है|

मंदिरों की देखभाल

डाकुओं के पुनर्वास की योजना के तहत 2004 में आत्मसमर्पण कर चुके जसवंत सिंह गूजर, फिलहाल 19 साल से बटेसर के मंदिरों की देखरेख कर रहे हैं| सैलानियों को वह इस इलाके की खूबियों और खामियों से रूबरू कराते हैं| मायूसी भरे अंदाज में जसवंत कहते हैं कि दुर्दांत डाकू निर्भय गूजर, मलखान सिंह, पुतली बाई और सुल्ताना डाकू तो अब नहीं रहे, लेकिन इस युग के खनन माफिया इस विरासत के लिये नये खतरे के रूप में उभरे हैं| जसवंत सिंह को 19 साल से मोहम्मद की योजना के परवान चढ़ने का इंतजार है|