बंगाल का रण अब तक की सबसे बड़ी चुनावी जंग

बंगाल के चुनाव का शंखनाद हो चुका है सभी पार्टिया चुनाव जीतने के लिये कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती है। इसके लिये प्रचार में जुट चुकी है। लेकिन इस राज्य में आजादी के बाद किसका दबदबा रहा है चलिये इसपर एक नजर डालते है।

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कांग्रेस वामपंथ, तृणमूल को मिल चुका है सत्ता में रहने का मौका

बंगाल की सियासी जमीन पहले कांग्रेस, फिर वाममोर्चा और उसके बाद तृणमूल कांग्रेस के लिए काफी उपजाऊ रही है। आजादी के बाद से 1977 के शुरुआत तक, बीच में कुछ वर्षो को छोड़ दें तो सूबे में कांग्रेस का एकछत्र राज रहा। वही साल 1977 में माकपा की अगुआई में वाममोर्चा सत्ता पर ऐसे काबिज हुआ कि 34 वर्षो तक शासन में रहा। मई 2011 में वामपंथी शासन का अंत हुआ और पिछले करीब एक दशक से तृणमूल सत्तासीन है, लेकिन जिस बंग भूमि पर जनसंघ के संस्थापक डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म हुआ वो बीजेपी के लिए तीन साल पहले तक बंजर थी। लेकिन धीरे धीरे इसकी जमीन भी मजबूत होते हुए दिखाई दे रही है। जिसका जीता जागता उदाहरण पिछले साल लोकसभा के चुनाव में देखा गया था। जब बीजेपी को उम्मीद से ज्यादा सांसद मिले। जिससे राजनैतिक गुरू भी हक्काबक्का रह गये थे। लेकिन ये जरूर है कि बीजेपी की जीत के बाद राज्य में अब कई पार्टिया अपना वजूद बचाने के लिए चुनाव लड़ रही है।

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बेरोजगारी, भ्रष्टाचार सहित कई मुद्दे अहम

वैसे हर चुनाव में बेरोजगारी भ्रष्टाचार का मुद्दा सबसे बड़ा मुद्दा रहा है लेकिन इस बार बंगाल चुनाव में इस मुद्दे की खास जगह रहने वाली है। कारण इसका ये है कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष दोनो ही कोरोना काल के दौरान बेरोजारी बढ़ने की बात कर रहे है लेकिन इसके समाधान के लिये कोई ठोस कारण नही दे पा रहे है इसी तरह 2 बार से सत्ता में रहने के बाद सरकार पर कई भ्रष्टाचार के आरोप लगाये जा रहे है जो प्रदेश में बढ़ते अपराध पर भी लोग वोट करने का मन मनायेगे क्योकि अगर अपराध कम नही होगा तो राज्य में निवेश कम संख्या में आ सकता है जिसका असर लोगों के रोजगार पर पड़ सकता है। इन प्रमुख मुद्दो को लेकर वोटर किस तरफ जायेगा ये भी अपने आप में एक सवाल है।

इस बार होने जा रहे चुनाव में भी जनता का मूड हर कोई जानने को बेताब है। हरेक दल का अपना-अपना दावा है। लड़ाई भी काफी कड़ी है। यहां की जनता का फैसला क्या होगा? यह तो दो मई को पता चलेगा। पर एक बात जो सबसे खास है, वह यह कि अब बंगाल के लोग भी हरेक चुनाव में किसी एक दल या मोर्चा को समर्थन देने के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में चुनाव बहुत खास होने वाला है ये तो तय है