बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी फौज की आन, बान की झलक

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बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी

राजपथ पर 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस की परेड में अपने शौर्य के प्रदर्शन के बाद अब बारी है बीटिंग रिट्रीट समारोह का, जिसमें सेना के बैडों द्वारा ऐसा सूरीला समा बाधा जाता है जिसको देखकर लोग देशभक्ति में झूम उठते है। यहां ये भी बताना जरूरी है कि इस समारोह के साथ ही गणतंत्र दिवस समारोह का समापन हो जाता है। गणतंत्र दिवस उत्सव में बीटिंग रिट्रीट एक अहम पल होता है, लेकिन ये क्यो बनाया जाता है इसके बारे में चलिये कुछ खास बाते जानते है।

सेरेमनी की खास बाते

बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी राष्ट्रपति भवन के सामने 29 जनवरी को ही होता है। परंपरा के मुताबिक 26 जनवरी की परेड में तीनों सेना राष्ट्रपति के सामने शक्ति प्रदर्शन करते हैं, जिसके बाद बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी में राष्ट्रपति की अनुमति लेकर अपने बैरक में लौट जाते हैं। बीटिंग द रिट्रीट सेरेमनी के मुख्य अतिथि राष्ट्रपति ही होते हैं औऱ इसका मुख्य आकर्षण तीनों सेनाओं का एक साथ मिलकर सामुहिक बैंड का कार्यक्रम प्रस्तुत करना होता है। इतना ही नहीं इस कार्यक्रम में ड्रमर ‘एबाइडेड विद मी’ धुन बजाते हैं, जो महात्मा गांधी के सबसे प्रिय धुनों में से एक थी। इसके बाद रिट्रीट का बिगुल बजता है, इस दौरान बैंड मास्टर राष्ट्रपति के नजदीक जाते हैं और बैंड वापस ले जाने की अनुमति मांगते हैं, इसी के बाद यह माना जाता है, कि समापन समारोह पूरा हो गया है। बैंड मार्च वापस जाते समय ‘सारे जहां से अच्छाब गाने’ की धुन के साथ कार्यक्रम का समापन होता है, अंत में राष्ट्रगान गाया जाता है और इस प्रकार गणतंत्र दिवस के आयोजन का औपचारिक समापन होता हैं।

बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी गणतंत्र दिवस की नई परंपरा नहीं है, ये अंग्रेजों के समय से आयोजित होती आ रही है। बीटिंग द रिट्रीट के मौके पर राष्ट्रपति भवन, विजय चौक के इर्द-गिर्द बने हुए सारे भवनों को सजाया जाता है। साथ ही बीटिंग रिट्रीट पर सेना का ऊंट दस्ता राजपथ पर शक्ति प्रदर्शन करते हैं, ऊंटों का ये दल रायसीना हिल पर उत्तर और दक्षिण ब्लॉक की प्राचीर पर खड़े दिखाई पड़ते हैं। दुनिया का यह इकलौता ऊंट दस्ता है जो न केवल बैंड के साथ राजपथ पर प्रदर्शन करता है बल्कि सरहद पर रखवाली भी करता है। 1976 में पहली बार 90 ऊंटों की टुकड़ी हुई थी, शाही और भव्य अंदाज में सजे ‘रेगिस्तान के जहाज’ ऊंट को सीमा सुरक्षा के लिए तैनात किया जाता है और पहली बार यह ऊंट दस्ता सन 1976 में इस राष्ट्रीय पर्व की झांकी का हिस्सा बना था। गौरतलब है कि इससे पहले सन 1950 से इसकी जगह सेना का ऐसा ही एक दस्ता गणतंत्र दिवस परेड का हिस्सा था, गणतंत्र दिवस जैसे समारोह के लिए अलग ड्रेस पहनते हैं, ऊंटों पर बैठने वाले जवान भी खास होते हैं। इनकी ऊंचाई 6 फुट या उससे अधिक होती है।

CISF ऐसे जवानों का चयन इस तरह के मौकों के लिेए करती है, इस ऊंट बटालियन की एक खास बात और है, इन ऊंटों पर बीएसएफ के जो जवान बिठाए जाते हैं, उनकी मूंछें भी सामान्य नहीं होती है, सभी की मूंछें ऊपर की ओर उठी हुई होती है जिससे इनको पहचाना जाता है, इनके गालों पर बढ़ी मूंछों को गलमुच्छा भी कहा जाता है।

जिसके के बाद ये जवान सभी देशवासियों से यही कहते हुए नजर आते है कि अब फिर देश की सुरक्षा के लिये हम सीमाओं की तरफ चलते फिर मिलेगे अगले साल इस खास समारोह में।

 


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