सेना के ऑपरेशन माँ ने कश्मीर में बदली तस्वीर, 50 युवकों ने छोड़ा आतंक का रास्ता

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कश्मीर स्थित भारतीय सेना की 15वीं कोर द्वारा की गई पहल ‘ऑपरेशन मां’ का असर दिखने लगा है। लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लन ने कहा कि सेना ने ऑपरेशन मां लांच किया है, जिसके तहत पिछले छह महीने में माताओं से बात करने के बाद 50 सशस्त्र आतंकी सामने आए और दहशतगर्दी का रास्ता छोड़ अपने परिवार के साथ आ गए। सेना इससे उत्साहित नज़र आ रही है। पुलवामा हमले के बाद सेना ने घाटी में सभी माताओं से अपने बच्चों को वापस लौटने के लिए अपील करने को कहा था। सेना ने कहा था कि मां की एक बड़ी भूमिका होती है और वे अपने बच्चों को वापस बुला सकती है।

ढिल्लन ने बताया कि कश्मीर में आतंकी संगठनों का नेतृत्व खत्म किया जा रहा है। जैश-ए-मोहम्मद के नेतृत्व का सफाया किया जा चुका है। उन्होंने दावा किया कि लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन के के आतंकी न्यूट्रल हो चुके हैं।

भारतीय सेना की 15वीं कोर को चिनार कोर भी कहा जाता है। चिनार कोर ने घाटी और नियंत्रण रेखा पर आतंकवाद से लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेफ्टिनेंट जनरल ढिल्लन ने कहा कि पत्थरबाजी की घटनाएं शून्य पर पहुंच गई हैं और आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन में भी कोई रुकावट नहीं आ रही।

एनकाउंटर रोककर कराया सरेंडर

जनरल कंवलजीत सिंह ढिल्लों ने बताया कि कुछ स्थानों पर मुठभेड़ ठीक बीच में रोककर भी आतंकवादियों का समर्पण कराया गया है। उन्होंने कहा, ‘स्थानीय आतंकियों के सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में फंसने की सूचना मिलने पर हम उसकी मां का पता लगाते हैं और दोनों की बातचीत कराने का प्रबंध करते हैं। कुछ मुठभेड़ों का अंत मां बेटे के करिश्माई मिलन से हुआ है और इस प्रकार सेना के प्रयासों से हमने कश्मीरी युवाओं की जान बचाई है। हमें शव गिनने का शौक नहीं है बल्कि उन युवाओं की संख्या गिनना पसंद करते हैं, जिन्हें हमने उनके परिजन से मिलवाया है। मैं प्रसन्न हूं कि इस साल 50 युवा अपने परिवार में वापस आ चुके हैं।’

एक साल से ज्यादा नहीं होती आतंकी की जिंदगी

सेना ने जो डाटा बनाया है उसके अनुसार आतंकी की उम्र एक साल से अधिक नहीं होती है। आतंकी संगठनों में शामिल होने वाले 83 प्रतिशत युवा पत्थरबाज थे। इसका मतलब यह है कि आज का पत्थरबाज कल का आतंकी है। ले. जनरल ढिल्लो के अनुसार आतंकी संगठनों में शामिल होने वाले सात प्रतिशत युवाओं की मौत दस दिनों के भीतर हो जाती है। नौ प्रतिशत की मौत एक महीने के भीतर, 17 प्रतिशत की तीन महीने के भीतर, 36 प्रतिशत की छह महीनों के भीतर और अन्य की एक साल के भीतर मौत हो जाती है।

लेफ्टिनेंट जनरल ढिल्लन ने कहा कि सेना अब जिस नई रणनीति पर काम कर ही है, वह आतंकियों को लॉन्च पैड्स और सीमा पर ही मार गिराने की है। उन्होंने उम्मीद जताई कि 2020 की गर्मियों में अधिक पर्यटक कश्मीर पहुंचेंगे और व्यापार को भी बढ़ावा मिलेगा।

 


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