आलमगीरी मस्जिद, गौरी मंदिर… ज्ञानवापी पर जितने मुंह उतने दावे, सच क्‍या है?

ज्ञानवापी का सच क्‍या है? अंतिम मुहर अदालत के फैसले से लगेगी। हर पक्ष के अपने दावे हैं। हिंदू पक्ष ने मंदिर में पूजा की बहाली की मांग को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया है। हिंदू पक्ष का कहना है कि मस्जिद को औरंगजेब के समय में शिव मंदिर तोड़कर बनाया गया। मुस्लिम पक्ष स्‍थानीय अदालत के सर्वे के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा चुका है। इस बीच, ज्ञानवापी में मस्जिद का प्रबंधन करने वाली अंजुमन इंतजामिया कमिटी के महासचिव अब्‍दुल बातिन नोमानी अलग दलील लेकर आए हैं। उनका दावा है कि ज्ञानवापी का नाम पहले आलमगीरी मस्जिद था। ज्ञानवापी मामले में सुप्रीम कोर्ट के रुख पर भी सबकी नजरें हैं। आइए समझते हैं कि पूरे विवाद पर अलग-अलग पक्षों के क्‍या दावे हैं।

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‘औरंगजेब के वक्‍त थी मस्जिद, आलमगीरी था नाम’
नोमानी ने एक टीवी चैनल से बातचीत में कहा कि ‘मस्जिद अकबर के जमाने में भी मौजूद थी, हमारे पास इसके प्रमाण भी मौजूद हैं। मौजूदा ढांचा औरंगजेब ने बनवाया है।’ उन्‍होंने कहा, ‘मस्जिद का असल नाम आलमगीरी मस्जिद है। ज्ञानवापी आज की डेट में मोहल्‍ले के तौर पर देखा जाता है।’ वाराणसी में ही पंचगंगा घाट पर आलमगीरी मस्जिद नाम की एक और मस्जिद मौजूद है।

मुस्लिम पक्ष की क्‍या दलील है?
अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमिटी की याचिका में वाराणसी स्थित ज्ञानवापी-शृंगार गौर परिसर में यथास्थिति बनाए रखने की गुहार लगाई गई है। दलील दी गई है कि मस्जिद काफी पुरानी है और वाराणसी कोर्ट का सर्वे का आदेश पूजा स्थल से जुड़े कानून के खिलाफ है। साल 1991 का यह कानून कहता है कि 15 अगस्‍त 1947 से पहले मौजूद किसी भी धर्म के उपासना स्‍थल को किसी दूसरे धर्म के उपासना स्‍थल में बदला नहीं जा सकता। यानी 15 अगस्‍त 1947 को जो जहां और जिस रूप में था, उसे वैसा ही कबूल करना होगा।

‘शिवलिंग’ पर क्‍या दावे हैं?
सोमवार को एक पक्ष ने दावा किया था कि परिसर में 12.50 फुट का शिवलिंग मिला है। मुस्लिम पक्ष ने इस दावे को गलत बताया। मुस्लिम पक्ष के वकील रईस अहमद ने कहा कि जिसे शिवलिंग बताया जा रहा है, उसमें एक छेद है। यह ऊपर से लेकर नीचे तक है। रईस ने दावा किया कि कोर्ट कमिशनर ने कथित शिवलिंग के ऊपर बने करीब एक इंच के छेद में सीक डलवाकर देखा तो यह 35 इंच तक चली गई थी। उन्होंने सवाल किया है कि क्‍या शिवलिंग में छेद होता है? इस पर हिंदू पक्ष ने यह कहते हुए पलटवार किया कि ड्रिल कर शिवलिंग को खंडित किया गया होगा। हिंदू पक्ष के वकील विष्‍णु जैन ने कहा कि फव्‍वारे और शिवलिंग के बीच का अंतर हमें पता है। यदि फव्‍वारा होता तो नीचे पूरा सिस्‍टम मिलता, जबकि ऐसा नहीं है। उसमें कुछ डंडियां डाली गई थीं पर वो ज्‍यादा अंदर तक नहीं गईं।

कहां है ज्ञानवापी मस्जिद?
ज्ञानवापी मस्जिद वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर के ठीक बगल में स्थित है। काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य द्वार से होकर ही मस्जिद में जाया जाता है। इसके आसपास व्यापारिक केंद्र है।

सर्वे का आदेश कैसे आया?
8 अप्रैल 2022 को कोर्ट ने कमिश्नर नियुक्त किया। कोर्ट कमिश्नर ने 19 अप्रैल को सर्वे की तारीख कोर्ट को बताई। 19 अप्रैल को विपक्षी अंजुमन अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमिटी ने हाई कोर्ट से सर्वे पर रोक लगाने की मांग की। हाई कोर्ट ने अर्जी खारिज कर निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा। 26 अप्रैल को निचली अदालत ने ईद के बाद सर्वे शुरू करने का आदेश दिया।

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क्या पहले भी हुआ था सर्वे?
1996 में 18 मई को अदालत ने कोर्ट कमिश्नर की नियुक्ति कर सर्व करने को कहा था। तय तिथि को दोनों पक्षों को नोटिस देकर बुलाया गया। वादी पक्ष से पांच और दूसरे पक्ष से 500 लोग पहुंचे। तनातनी की स्थिति पैदा हुई तो कोर्ट कमिश्नर ने कार्यवाही खारिज कर दी थी।

26 साल पहले सर्वेक्षण में भी मिले थे मंदिर के भग्‍नावशेष
ज्ञानवापी के विवादित स्‍थल के सर्वे का मामला नया नहीं है। शृंगार गौरी में नियमित दर्शन और आदि विश्‍वेश्‍वर परिवार के विग्रहों को यथास्थिति रखे जाने संबंधी याचिका पर अदालत आदेश से हुए सर्वे से पहले भी कमिशन की कार्यवाही में हिंदू मंदिर के भग्‍नावशेष मिलने का सच सामने आ चुका है। इतना ही नहीं विवादित स्‍थल की 15 अगस्‍त 1947 को धार्मिक स्थिति क्‍या थी, इसके निर्धारण के लिए पुरातात्विक सर्वेक्षण का भी अदालत ने आदेश दिया था, लेकिन मामला हाई कोर्ट में लंबित है।ज्ञानवापी परिसर में 26 साल पहले यानी 1996 में कमिशन की कार्यवाही सिविल जज के आदेश पर हुई थी। अदालत में दायर वाद एसिएंट आइडल स्‍वयंभू लार्ड विश्‍वेश्‍वर व अन्‍य में अधिवक्‍ता राजेश्‍वर प्रसाद सिंह को एडवोकेट कमिश्‍नर नियुक्‍त किया गया था। कमिशन की कार्यवाही की रिपोर्ट अदालत में पेश हुई थी। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि विवादित स्‍थल के चारों तरफ प्राचीन काल की निर्मित पुस्‍ती मिली, जो प्राचीन मंदिर का अवशेष प्रतीत हो रहा है। पश्चिम की ओर मंदिर के भग्‍नावशेष का ढेर हैं, जो बड़े चबूतरे के रूप में स्थित है। रिपोर्ट में यह भी साफ-साफ कहा गया है कि भग्‍नावशेष के ऊपर ही मस्जिदनुमा ढांचा निर्मित है। रिपोर्ट में पूरब परिक्रमा पथ से हटकर हनुमान जी की प्रतिमा व मंदिर, गंगा देवी व गंगेश्‍वर मंदिर के मौजूद रहने का भी जिक्र है।

क्या अयोध्या जैसी स्थिति?
देखा जाए तो वाराणसी की अदालत द्वारा दिया गया आदेश केस में मील का पत्‍थर साबित हो सकता है। क्‍योंकि एडवोकेट कमिश्नर की रिपोर्ट साक्ष्‍य अधिनियम और सिविल प्रक्रिया संहिता में बहुत अहम मानी जाती है। ऐसी ही शुरुआत 1950 अयोध्‍या राम जन्‍मभूमि मामले में हुई थी। फैजाबाद के सिविल जज ने विवादित स्‍थल का नक्‍शा तैयार करने के लिए कोर्ट कमिश्‍नर नियुक्‍त किया था। कोर्ट कमिश्‍नर की रिपोर्ट पर हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चर्चा हुई और वह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिस्‍सा भी है। हाईकोर्ट के आदेश पर विवादित स्‍थल की विडियोग्राफी-फोटोग्राफी और एएसआई की रिपोर्ट में आए साक्ष्‍य भी मुकदमे में अहम साबित हुए थे।