कृषि कानूनों की वापसी के बाद आंदोलन में शामिल किसान लौटना चाहते हैं घर

लोकसभा और राज्यसभा में कृषि कानून बिल की वापसी बिल पास हो जाने के बाद बहुत ऐसे किसान है जो अब आंदोलन खत्म करके अपने घर जाना चाहते है। इसके लिये उन्होने तैयारी भी कर ली है लेकिन कुछ किसान संगठन अब उन्हे रोकने में लगे है सिर्फ अपनी सियासत को चमकाने के लिये जबकि किसानों से अपना रुख साफ करते हुए वापस लौटने का एक तरह से मन भी बना लिया है।

India farmers protests: Thousands swarm Delhi against deregulation rules -  CNN

घर लौटने की तैयारी में किसान

आज किसान मोर्चा कितना भी ये बोल रहे हो कि वो अपना आंदोलन जारी रखेंगे लेकिन कही ना कही किसान अब अपना मन बना चुके हैं अपने घर वापस जाने का। किसानों की माने तो उनका कहना है कि सरकार ने किसान बिल को खत्म करने का बिल पास कर दिया है जिससे उनकी मांग पूरी हो गई है। ऐसे में अब वो खुश हैं वे अपने घर, अपने खेत और अपने बच्चों के पास वापस जाना चाहते हैं। गौरतलब है कि अपनी मांगों को लेकर किसान एक साल से अधिक वक्त तक दिल्ली की सीमा पर प्रदर्शन कर रहे है। वही 19 नवंबर को खुद पीएम मोदी ने किसानों के विरोध के चलते कानून को वापस लेने का ऐलान करके उनसे घर जाने की विनम्र अपील की थी।

कुछ लोग किसानों के सहारे चलाना चाहते हैं अपनी सियासी दुकान

हालांकि पीएम मोदी के कानून वापस लेने के बाद ही किसानों ने पीएम मोदी की तारीफ करते हुए उनका आभार जताया था। हालांकि किसानों के दम पर सियासत चमकाने वाले कुछ नेताओं को ये फैसला रास नही आया था और वो इसे चुनावी जुमला तक बोल रहे थे। संसद से कानून वापसी बिल पास हो जाने के बाद अब यही लोग दूसरे मुद्दो को लेकर किसान को रोकना चाहते हैं जबकि किसान अब उनकी चाल में नहीं फंसना चाहता है और वो धरना खत्म करके अपने घर अपने खेतों में लौटना चाहता है जिससे इन लोगों के पेट में सिकुड़न बढ़ा दी है। हाल ही में संयुक्त किसान मोर्चा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा था कि जब तक सरकार उनकी छह मांगों पर वार्ता बहाल नहीं करती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। मोर्चा ने छह मांगें रखीं, जिनमें एमएसपी को सभी कृषि उपज के लिए किसानों का कानूनी अधिकार बनाने, लखीमपुर खीरी घटना के संबंध में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा को बर्खास्त करने और उनकी गिरफ्तारी के अलावा किसानों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने और आंदोलन के दौरान जान गंवाने वालों के लिए स्मारक का निर्माण शामिल है।

किसान इन मांगो को लेकर अब विभाजित दिख रहे हैं क्योंकि वो भी समझ रहे है कि कही ना कही अब उनके नाम पर सरकार के साथ दबाब की सियासत की जा रही है जो एक तरह से गलत है।