आखिर नेता जी के महत्व को बताने में कंजूसी क्यो ?

आज देश अपने सबसे चहेते लाल नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125 वीं जयंती पराक्रम दिवस के तौर पर मना रहा है। वैसे नेता जी के बार में आप ने कई किस्से सुने होगे लेकिन आज जो किस्सा हम बता रहे है उसे इतिहास में हमेशा दबाया गया है या यूं कहे कि एक परिवार को खुश करने के चलते कुछ इतिहासकारों और बुद्धीजीवियों ने हमें बताने में कंजूसी की लेकिन चलिये आज हम आपको इसके बारे में बताते है।

वर्ष 1956 का एक किस्‍सा

सबसे पहले आपको एक  किस्सा साल 1956 का बताते है जब भारत को आजादी मिले 9 वर्ष हुए थे। उस समय ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री लॉर्ड क्‍लीमेंट एटली कलकत्ता आए थे जहां उन्होंने पश्चिम बंगाल के उस समय के गर्वनर पीबी चक्रवर्ती से मुलाकात की थी। पीबी चक्रवर्ती ने तब एटली से पूछा था कि जब 1942 में अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ और 1944 में बिना परिणाम के खत्म हो गया,  तो अंग्रेज भारत छोड़ने के लिए तैयार क्यों हो गए ?इस सवाल पर एटली ने कहा था कि इसके पीछे सुभाष चंद्र बोस और उनकी आजाद हिंद फौज थी, जिसने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर किया।  इस पर पीबी चक्रवर्ती ने एक और सवाल पूछा, तो फिर भारत की आजादी में महात्मा गांधी की क्या भूमिका थी। इसके जवाब में एटली ने कहा था कि महात्मा गांधी का भारत की आजादी में योगदान बहुत कम था। ये किस्सा बताता है कि उस समय की भारतीय राजनीति में सुभाष चंद्र बोस के प्रयासों को कमजोर किया गया और उनके महत्व को कम करके दिखाया गया, जिससे उन्हें वो पहचान नहीं मिली, जिसके वो हकदार थे।लेकिन अगर ऐसा नहीं होता और सुभाष चंद्र बोस भारत की आजादी से 727 दिन पहले 1945 में रहस्यमय तरीके से लापता नहीं हुए होते तो भारत की राजनीति बिल्कुल अलग होती। लेकिन आज देश के सामने सत्य सामने आ रहा है जिसमे पता चल रहा है कि आजादी दिलवाने में महज कुछ लोगो का योगदान नही बल्कि समूचे देश से उपजी क्रांति का ही महात्वपूर्ण रोल था।

नेता जी की सोच को कुछ लोगों ने दबाया

अपनी हिम्मत, साहस और दूरदृष्टि की वजह से ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजादी के अपने लक्ष्य से भटके नहीं। लेकिन कई बार ऐसा हुआ जब कांग्रेस के भीतर बने एक गठजोड़ ने उनके विचारों को वो सम्मान नहीं दिया। जिसकी उन्हें उम्मीद थी। इस बात को आप इस तरह समझ सकते है कि सुभाष चंद्र बोस का मानना था कि 1939 में जब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ तब अंग्रेजों की भारत पर पकड़ कमजोर होने लगी थी और बोस उस समय अंग्रेजों के खिलाफ बड़ा आंदोलन करना चाहते थे। लेकिन बोस के इस विचार का महात्मा गांधी और नेहरू ने समर्थन नहीं किया और इसे खारिज कर दिया गया  लेकिन 3 साल बाद ये गठजोड़ इसी विचार से प्रभावित होकर काम करने लगा और गांधीजी ने तब करो और मरो का नारा भी दिया। यानि जब बोस कह रहे थे तो उनकी बात नहीं मानी और बाद में उनके ही विचारों को अपनाना पड़ा। इसी तरह सुभाष चंद्र बोस का कहना था कि आजादी के लिए सही समय का इंतजार करना गलत रणनीति होगी।  लेकिन गांधीजी ने उनकी बात नहीं मानी और ये कहा कि इसके लिए कांग्रेस में संगठन को मजबूत करना होगा और लोगों को ट्रेनिंग देनी होगी। महात्मा गांधी ने बोस के इस विचार को भी नकार कर दिया लेकिन वर्ष 1942 में वो इसके लिए तैयार हो गए और तब भारत छोड़ो आंदोलन उन्होंने शुरू किया और सबसे अहम इसके लिए बोस को कोई श्रेय नहीं दिया गया, जबकि कहा जाता है कि ये विचार उन्हीं का था।

मतलब साफ था कि आज खुलकर ये बात उजागर हो रही है कि आजादी की लड़ाई में कही न कही कुछ लोग अपने हित भी साधने में जुटे हुए थे वो ये चाहते थे कि आजादी तो मिले लेकिन आजादी के नायक वही बने रहे बस इस लिये वो दूसरो को पीछे करते रहे लेकिन अब इस धीरे धीरे हकीकत सामने आ रही है।