एकाएक कृषि बिल को वापस लेने के बाद आखिर पीएम मोदी ने देश को क्या संदेश दिया ?

कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने का फैसला लेकर केवल विपक्ष को ही झटका नहीं दिया बल्कि ये भी साबित कर दिया है कि सही मायने में वे जननेता हैं। जननेता जनता की आवाज होते हैं, जननेता जनता की नब्ज समझते हैं, जननेता जनता के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार रहते हैं। वास्तविक लोकतंत्र वहीं होता है जहां हर आदमी की सुनी जाती है, देश के अंतिम आदमी तक की आवाज को अनसुना नहीं किया जाता है। पीएम मोदी आज वही किया। उन्होंने यह जानते हुए भी कि किसान आंदोलन कोई राष्ट्रीय आंदोलन नहीं है फिर भी किसान कानूनों को वापस लेने की जहमत उठाई वो उनकी सादगी को दिखाता है।

जब चुनाव सिर पर हों, जनता से सार्वजनिक माफी मांगना आसान काम नहीं

इतिहास में बहुत कम मौके ऐसे आए होंगे जब किसी देश में जनता के भारी बहुमत से चुनकर आया हुआ कोई लोकप्रिय नेता, विश्व राजनीति में अपनेी कौशल का परचम लहराने वाला कोई शख्स जनता के सामने क्षमा प्रार्थी बन गया हो। पीएम मोदी ने अपने हाव-भाव से अपने आलोचकों का मुंह हमेशा के लिए बंद करा दिया जो मानते रहें हैं कि वे अपने आगे किसी को नहीं समझते। प्रधानमंत्री ने जनता को संबोधित करते हुए कहा कि ‘मैं देशवासियों से क्षमा मांगते हुए, सच्चे मन से कहता हूं कि शायद हमारी तपस्या में भी कोई कमी रह गई थी। हम अपनी बात कुछ किसान भाइयों को समझा नहीं पाए। आज गुरु नानक जी का प्रकाश पर्व है। आज मैं पूरे देश को ये बताने आया हूं, हमने 3 कृषि कानूनों को वापस करने का निर्णय किया है। हम तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की संवैधानिक प्रक्रिया जल्द शुरू करेंगे।“ पीएम नरेंद्र मोदी ने जिस तरह जनता के सामने आकर माफी मांगी वो उन्हें महान बनाता है। राष्ट्र के नाम संबोधन के दौरान उनका हाव-भाव आज उन्हें विश्व के महान नेताओं की कतार में खड़ा करता है। उनके आलोचकों का ये कहना कि कृषि कानूनों की वापसी चुनावों को ध्यान में रखकर की गई है, अगर सही भी है, तो भी इसे जनता को ध्यान में रखकर लिया गया फैसला ही कहा जाएगा।

केवल किसानों के एक वर्ग को थी दिक्कत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में एक बात नोट करने वाली थी कि उन्होंने जोर देते हुए कहा कि किसानों के एक वर्ग ने उनकी बात नहीं समझी। मतलब ये कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यकीन है कि आज भी अधिकतर किसानों को सरकार के तीनों कृषि कानूनों से कोई दिक्कत नहीं थी। इसके बावजूद पीएम ने कृषि कानूनों को वापस लेने का जज्बा दिखाया। पीएम मोदी किसान कानूनों की जब भी चर्चा करते रहे उन्होंने ये बताने की कोशिश रहती कि ये कानून छोटे किसानों की जिंदगी में बहार लाएंगे। दरअसल देश में करीब 85 प्रतिशत किसान छोटे किसान ही हैं। कृषि कानूनों का मुख्य उद्दैश्य ही छोटे किसानों का कल्याण करना था। कृषि कानूनों को वापस लेने के फैसले करते हुए पीएम ने एक बार फिर छोटे किसानों की समस्याओं का जिक्र किया। पीएम मोदी ने कहा कि मैंने 5 दशक के अपने सार्वजनिक जीवन में किसानों की समस्याओं और चुनौतियों को काफी करीब से देखा है। जब देश ने 2014 में मुझे सेवा करना का मौका दिया तो हमने कृषि कल्याण को प्राथमिकता दी। छोटी सी जमीन के सहारे छोटे किसान अपना और अपना परिवारों का गुजारा करते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी परिवारों में होने वाला बंटवारा इसे और छोटा कर रहा है। छोटे किसान की चुनौतियों को कम करने के लिए बीज, बीमा, बाजार और बचत पर चौतरफा काम किया है।

पीएम मोदी के ऐलान के बाद ये तो साबित हो गया कि पीएम मोदी जनता और राष्ट्रहित के आगे कभी भी समझौता नही करते और हालात कोई भी हो वो कठोर से कठोर फैसला लेने के लिये भी तैयार रहते है।