‘टफ’ मोदी के अंदर भी धड़कता है एक ‘सॉफ़्ट’ दिल

पीएम मोदी ने आक्रामक राजनेता और सख्त प्रशासक के तौर पर देश-दुनिया में अपनी छाप पिछले  कुछ वर्षों में छोड़ी है, लेकिन उनके कोमल और संवेदनशील व्यक्तित्व की चर्चा कम ही होती है. विरोधी तो उन्हें ‘तानाशाह’ ठहराने में ही लगे रहते हैं, लेकिन देश में पिछले दो दिनों से ‘इमोशनल मोदी’ की जमकर चर्चा हो रही है. राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आज़ाद को विदाई देते हुए पीएम मोदी का भावुक होना, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वो भी मुस्लिम, आजाद की जमकर तारीफ करना, करोड़ों लोगों को मोदी के व्यक्तित्व के एक अलग पहलू से परिचय करा रहा है.

 

देश के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर एक बात हमेशा कहा करते थे. बात ये कि एक राजनेता के व्यक्तित्व का 90 प्रतिशत हिस्सा मानवीय पक्ष होता है और महज़ दस प्रतिशत राजनीति. लेकिन नेता की त्रासदी ये होती है कि सार्वजनिक जीवन में उसके व्यक्तित्व का महज़ दस प्रतिशत हिस्सा उजागर होता है, 90 प्रतिशत की जल्दी कोई चर्चा नहीं करता, आलोचक तो कभी नहीं. चंद्रशेखर की यही बात मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर पूरी तरह लागू होती है.

राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आज़ाद सहित जम्मू-कश्मीर के चार राज्यसभा सदस्यों के विदाई समारोह में हिस्सा लेने के लिए मंगलवार की सुबह साढ़े दस बजे के क़रीब जब पीएम सदन में पहुंचे थे, तो ज़्यादातर लोगों को ये अंदाज़ा नहीं था कि उनके सियासी पक्ष की जगह मानवीय पक्ष की झलक सदन सहित पूरे देश के लोगों को देखने को मिलेगी. अमूमन होता ये है कि हर दो साल में एक बार ऐसा मौक़ा आता है जब राज्यसभा से एक तिहाई सदस्यों की विदाई होती है और पीएम उन्हें विदाई देने के लिए आते हैं, संक्षिप्त भाषण होता है, आधे घंटे से ज़्यादा रुकते नहीं वो.

लेकिन मंगलवार के दिन जो हुआ, उसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी. पीएम मोदी आधे घंटे की कौन कहे, पूरे ढाई घंटे तक बैठे. और इस दौरान गुलाम नबी आज़ाद की चर्चा करते हुए भावनाओं के ज्वार में बह गए, उनकी आंखों से आंसू निकल आए, गला रुंध गया. पीएम मोदी याद कर रहे थे उस समय की, जब वो ख़ुद गुजरात के सीएम थे और गुलाम नबी आज़ाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री. क़रीब डेढ़ दशक पुरानी ये घटना थी, जब गुजरात से कश्मीर घूमने के लिए गए पर्यटकों की बस पर आतंकियों ने ग्रेनेड फेंककर हमला किया था. 26 मई 2006 को हुए इस हमले में तीन बच्चों सहित चार लोगों की मौत हुई थी, जबकि आधे दर्जन से अधिक लोग घायल हुए थे.

उस घटना की जानकारी देने के लिए आज़ाद ने जब मोदी को फ़ोन किया था, तो वो रो रहे थे. आज़ाद को रोते हुए लोगों ने टीवी चैनलों पर तब भी देखा था, जब वो विशेष विमान के ज़रिये घायलों और मृतकों को श्रीनगर एयरपोर्ट से गुजरात भेज रहे थे. वहां भी आज़ाद पीड़ित परिवारों से ये कहते नज़र आए थे कि फल और फूल लेकर आपको भेजना चाहते थे, लेकिन आपके बच्चों की लाशें भेज रहे हैं, बहुत अफ़सोस में हैं, हम सबको माफ़ करना.

मोदी ने जिस घटना को याद किया, उसे ख़ुद आज़ाद ने भी याद किया, जब उनके बोलने की बारी आई. आज़ाद ने बताया कि जीवन में पांच ऐसे मौक़े आए थे, जब वो फफक-फफक कर रोए थे, संजय, इंदिरा, राजीव गांधी की अलग-अलग समय में हुई मौत के बाद, ओडीशा में आए चक्रवाती तूफ़ान से हुई तबाही को देखकर और फिर गुजराती पर्यटकों पर हुए हमले की जानकारी मिलने के बाद. कश्मीर की उसी घटना को याद करते हुए आज़ाद ने कहा था कि इस देश से आतंकवाद जल्दी से जल्दी ख़त्म हो, यही अल्लाह और ईश्वर से उनकी दुआ होगी.

सवाल ये उठता है कि  आज़ाद के बारे में बात करते हुए मोदी को 2006 का वो वाक़या क्यों याद आया. इसका जवाब हमें चंद्रशेखर की उसी मशहूर लाइन में ढूंढना होगा. हमें ये स्वीकार करना होगा कि एक सख्त प्रशासक, असाधारण तौर पर लोकप्रिय नेता, दुश्मन के सामने पूरी ताक़त से लड़ने और बोलने वाले व्यक्ति का दिल भी कोमल हो सकता है, सहज मानवीय गुण उसके अंदर भी हो सकता है, वो भी समय-समय पर इमोशनल हो सकता है, जिसे आलोचक कभी स्वीकार नहीं कर पाएंगे, उसमें भी आलोचना का कोई बहाना ढूंढ़ निकालेंगे.

नरेंद्र मोदी की राजनीति और बतौर प्रशासक उनके कामकाज को पिछले दो दशक से काफ़ी नजदीक से देख रहा हूं. अक्टूबर 2001 में जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री पद की पहली बार शपथ ले रहे थे, उस वक़्त मैं भी गुजरात में था और जब मई 2014 में वो बतौर पीएम दिल्ली में केंद्र सरकार की बागडोर संभालने आए थे, तब तक मैं भी दिल्ली आ चुका था. इस दो दशक के कालखंड में मैंने कई बार मोदी को इमोशनल होते हुए देखा है, इस कारण मेरे लिए राज्यसभा में मोदी का ये कोमल स्वरुप देखना नया नहीं था. लेकिन देश के ज़्यादातर लोगों के लिए ये मोदी के व्यक्तित्व की एक और झांकी थी, विशिष्ट झांकी थी.

सोचा कि मंगलवार के दिन ही इस पर कुछ लिखूं. लेकिन जानबूझकर दो दिन की देरी की. देखना चाह रहा था कि आख़िर देश में लोग इसे किस तरह से ले रहे हैं. कई जानकारों के फ़ोन आए, धनबाद से लेकर अहमदाबाद तक, पटना से लेकर हैदराबाद तक. सबकी ज़ुबान पर एक ही बात थी, मोदी ने दिल जीत लिया. दरअसल कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि बतौर सीएम या पीएम अपने कामकाज से शोहरत बटोरने के साथ ही कांग्रेस को लगातार निशाने पर लेकर जिस व्यक्ति ने पिछले दो दशक में राजनीति में इतना बड़ा मुक़ाम हासिल किया हो, वो व्यक्ति उस कांग्रेस पार्टी के नेता के बारे में बात करते हुए फफक-फफक कर रोना शुरु कर देगा, इतना इमोशनल हो जाएगा. और वो भी किस नेता के लिए, जिसने अपनी राजनीतिक यात्रा के दौरान मोदी पर सियासी हमले करने में कोई कसर नहीं छोड़ी हो, राज्यसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर लगातार मोदी की अगुआई वाली सरकार को घेरने की कोशिश की हो और वो भी एक मुस्लिम हो, जम्मू-कश्मीर का, जिसने आर्टिकल 370 की समाप्ति के समय जमकर मोदी सरकार की आलोचना की हो.

मोदी के प्रशंसकों की तो ठीक, लेकिन आलोचकों के लिए ये परिस्थिति असह्य थी. आख़िर मोदी की छवि को पिछले दो दशक में वो घनघोर मुस्लिम विरोधी और क्रूर नेता की ही तो बनाते आए हैं, जिसके दिल में न तो अपने विरोधियों के लिए कोई जगह है और न ही जो अपने विरोधियों के बारे में कुछ अच्छा बोल सकता है, सिर्फ ज़मींदोज़ कर सकता है. लेकिन सदन में मोदी जब बोल रहे थे और भावनाओं का ज्वार जब फूट पड़ा था, तो उनकी सियासत का विरोध करने वाले कई दलों के सांसदों के मन में भी उनके लिए एक अलग भावना पैदा हो रही थी, मोदी का मानवीय पक्ष उन्हें दिख रहा था. अगर कुछ अलग था, तो ये कि जिस पार्टी कांग्रेस की चार दशक से भी अधिक समय से सेवा गुलाम नबी आज़ाद अपने लंबे कैरियर में अलग-अलग रुप में करते रहे हैं, उस पार्टी के किसी भी नेता ने आजाद के बारे में मोदी की भावनाओं को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की, नोटिस तक लेने की कोशिश नहीं की, पूरी तरह चुप्पी साध ली. वो भी तब जब सदन के अंदर कांग्रेस पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेता मौजूद थे, और हतप्रभ होकर मोदी को सुन रहे थे.

 

जहां तक मोदी का सवाल है, उनका दिल कितना कोमल है, इसकी झलक कई बार देखने को मिली है. कई बार मोदी इमोशनल हुए हैं, आंखें भर आई हैं, गला रुंध आया है. चाहे वो 2007 में गांधीनगर के टाउन हॉल में पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच हो या फिर मई 2014 में संसद के सेंट्रल हॉल में आधिकारिक तौर पर सदन का नेता चुने जाने का समय हो, या फिर अगले दिन गुजरात विधानसभा में विदाई का समारोह हो, जहां बतौर सीएम पौने तेरह साल तक अपनी दमदार उपस्थिति दिखाने के बाद मोदी दिल्ली का रुख़ कर रहे थे पीएम के तौर पर. इसके अलावा भी कई और मौक़े आए, जब इमोशनल मोदी को देश और दुनिया ने देखा. 2015 में फ़ेसबुक इवेंट, 2016 में एक यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में या फिर नोटबंदी के पांच दिन बाद, 2018 में नेशनल पुलिस मेमोरियल के कार्यक्रम में भी. यहां तक कि कोरोना के पिछले एक साल के संकट काल के दौरान भी जब मोदी कई दफ़ा देशवासियों से मुख़ातिब हुए, वो इमोशनल हुए, उनकी आंखें भर आईं.

दर्जन भर से भी अधिक ये सारे वाक़ये तो लोगों ने टीवी के पर्दे पर पिछले कुछ वर्षों में देखे हैं, लेकिन मोदी के मानवीय स्वरूप की झलकियां और कहानियां देश के उन लाखों लोगों के पास भी है, उनकी ज़ुबान पर है, जिनसे वो समय-समय पर मुख़ातिब होते रहे हैं, निजी तौर पर मिलते रहे हैं या फिर जिनसे उनकी बातचीत होती है, लेकिन ये सारी बातें-मुलाकातें न तो किसी अख़बार की सुर्ख़ियां बनती है और न ही किसी टीवी चैनल पर नज़र आती है, लेकिन ऐसे लाखों-करोड़ों लोगों के दिल और दिमाग़ पर मोदी की अमिट छाप छोड़ जाती हैं.

मोदी के इस मानवीय स्वरूप की नोटिस पक्ष तो ठीक, विपक्ष के कई बड़े चेहरों ने भी कई बार खुलकर तो कई बार दबी जुबान में ली है. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भला कैसे भूल सकते थे कि जितना सम्मान उनकी अपनी पार्टी ने उन्हें नहीं दिया, उससे ज़्यादा मोदी ने दिया, जब उनके हाथ में मौक़ा आया, भारत रत्न इनायत करने सहित. मुलायम सिंह यादव से लेकर लालू प्रसाद यादव, जो राजनीतिक तौर पर मोदी के घनघोर विरोधी हैं, निजी तौर पर इसकी नोटिस लेते हैं. आख़िर लालू का जब चुनावों के दौरान मंच टूटा था और वो घायल हुए थे, तो पहला फ़ोन मोदी का ही आया था. मुलायम सिंह यादव भला कैसे भूल सकते हैं कि चाहे 2014 में मोदी का बतौर पीएम पहला शपथ ग्रहण हो या फिर 2017 में योगी के यूपी सीएम के तौर पर शपथ ग्रहण का मौक़ा रहा हो, उनको कितना सम्मान दिया गया था, जब इन दोनों ही जीत के हीरो मोदी रहे थे.

जहां तक सदन के अंदर विरोधियों के साथ बेहतर रिश्ते और सम्मान देने का सवाल है, गुलाम नबी आज़ाद का उदाहरण अकेला नहीं है. 2014 में पीएम की कुर्सी संभालने के पहले जब मोदी बतौर सीएम पौने तेरह साल तक गुजरात विधानसभा में अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज कराते रहे, उस दौर में भी विधानसभा में विपक्ष के नेता की भूमिका संभालने वाले ज़्यादातर नेताओं से उनके संबंध काफ़ी अच्छे रहे. चाहे अमरसिंह चौधरी रहे हों, या शक्तिसिंह गोहिल या फिर शंकरसिंह वाघेला. इन सबसे निजी रिश्ते मोदी ने बेहतरीन रखे. गुजरात के सीएम रह चुके अमरसिंह चौधरी से तो मोदी की इतनी बनती थी या फिर उनकी सेहत को लेकर मोदी हमेशा इतने गंभीर रहते थे कि कई बार सियासी हलकों में ये चर्चा रहती थी कि गुजरात विधानसभा में सदन के नेता मोदी और नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने वाले चौधरी के बीच कोई गुप्त समझौता है. एक समय गुजरात विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे और फ़िलहाल राज्यसभा सदस्य शक्तिसिंह गोहिल भी सदन के अंदर मोदी पर ज़ोरदार हमला बोलते थे, लेकिन जून 2011 में जब उन्हें दिल का दौरा पड़ा था तो मोदी भागकर उन्हें अहमदाबाद के साल अस्पताल देखने गये थे, उनका हालचाल पूछा था. शंकरसिंह वाघेला तो एक समय संघ और बीजेपी का ही हिस्सा थे, लेकिन बाद में मोदी से सियासी जंग लड़ते हुए पार्टी छोड़ दी थी और 1998 में कांग्रेस में चले गये थे और फिर मोदी के आख़िरी कार्यकाल के दौरान विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रहे. जब मई 2014 में मोदी को गुजरात विधानसभा में विदाई दी जा रही थी, तो उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर बनाने की मोदी से अपील भी की थी और संयोग ऐसा कि मोदी के पीएम रहते हुए ही अयोध्या में मंदिर निर्माण का न सिर्फ रास्ता प्रशस्त हुआ, बल्कि उनके हाथ ही भूमि पूजन भी हुआ. शंकरसिंह वाघेला की पोती की जब शादी हो रही थी, तब भी वहांं सबसे पहुंचने वालों में मोदी थे. पिछले साल जून में जब वाघेला को कोरोना हुआ, उस वक़्त भी मोदी का फ़ोन उनके पास आया था सेहत के बारे में जानकारी लेने के लिए. कहने का अर्थ ये कि सियासत अपनी जगह, लेकिन जहां तक निजी रिश्ते निभाने का मामला हो, उसमें मोदी ने कभी कोई कमी नहीं की. ज़ाहिर है ये तमाम नेता भी इस बात को भूल नहीं सकते.
भूल तो वो लोग भी नहीं सकते, जो  वीआईपी नहीं है, सामान्य पृष्ठभूमि से आते हैं, लेकिन एक बार मोदी से मिले, तो उनके दीवाने हो गए. धनबाद के दीपेश याज्ञ्निक को आज भी याद है कि जब सवा  दशक पहले 2008 में  वो मोदी से मिलने गांधीनगर गए थे, तो किस तरह बिल्कुल तय समय पर मोदी ने उन्हें मिलने के लिए अंदर बुला लिया था, वो भी तब जब मोदी के सबसे विश्वस्त सहयोगी अमित शाह बाहर बैठे हुए थे और मोदी ने खड़े होकर उनका स्वागत किया था, खूब आत्मीयता से बात की थी. मांगरोल के माधाभाई भद्रेसा भी भला कैसे भूल सकते हैं कि वो मोदी के पीएम बनने के बाद उनसे मिलने के लिए संसद भवन आए हुए थे और वहां मोदी न सिर्फ़ बड़ी गर्मजोशी से उनसे मिले थे, बल्कि बड़े प्रेम से साथ में फ़ोटो भी खिचवाई थी. न्यूज़ीलैंड में रह रहे केतन त्रिवेदी भी भला कैसे भूल सकते हैं कि एक संदेश छोड़ने के साथ ही मोदी ने ब्रिसबेन में जी-20 के अपने व्यस्त कार्यक्रम के बीच 2014 में उनके लिए समय निकाला था और पुराने दिनों को बड़े ही सहज ढंग से याद किया था.

से अनगिनत क़िस्से देश-विदेश में मोजूद लाखों लोगों के पास हैं, मौलिक हैं और अप्रकाशित हैं. मोदी की ये सबसे बड़ी खूबी है, क्या आम और क्या ख़ास, सबसे दिल का रिश्ता बना लेते हैं वो. मोदी की यही खूबी उनके सियासी विरोधियों, ख़ासकर गांधी-नेहरू परिवार की स्थाई अगुआई वाली कांग्रेस को समझ में नहीं आती और इसलिए हमेशा मार खा जाती है वो पार्टी और उसके नेता, मोदी के सामने. आख़िर ‘युवा तुर्क’ की सलाह भी भला कहां गांधी परिवार को समझ में आई थी, आपातकाल या उसके बाद भी. लेकिन मोदी ने चंद्रशेखर की उस सलाह को आत्मसात किया है और इसलिए मानवीय संबंधों को मज़बूती से लेकर आगे बढ़ते हैं, रिश्ते बनाते हैं, जिसके फ़ैन सिर्फ़ गुलाम नबी आज़ाद नहीं होते, करोड़ों देशवासी होते हैं. शायद चंद्रशेखर का जो दूसरा दर्द राजनेताओं के मानवीय पक्ष की उपेक्षा या उस पर चर्चा न होने को लेकर था, मोदी के मामले में वो शिकायत दूर हो जाए, क्योंकि देश और दुनिया में करोड़ों लोग इसकी नोटिस ले रहे हैं.

सभार -ब्रजेश कुमार सिंह (लेखक नेटवर्क18 समूह में मैनेजिंग एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं)

Originally Published At- News18