भारत को साउथ ईस्ट एशिया से जोड़ने का बनेगा छोटा रास्ता, चीन की मोनोपोली भी होगी कम

गलवान से चीन फौज के पीछे हटने के बाद भी मोदी सरकार चीन से सटे मोर्चे पर शांत नहीं बैठी है। मोदी सरकार अच्छी तरह से जानती है कि चीन फिर से कोई हरकत करे इससे पहले उसे इस पूरे इलाके में पहले से ज्यादा मजबूत होना पड़ेगा। इसी क्रम में अब भारत ने मिजोरम में म्यांमार बॉर्डर पर बसा आखिरी गांव काकीचुआ में कालादान मल्टी मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है। जिसके बाद माना जा रहा है कि ये इलाका गेट वे ऑफ साउथ ईस्ट एशिया कहा जायेगा।

क्या है कालादान प्रोजेक्ट

कालादान मल्टी मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट कोलकाता से म्यांमार और फिर म्यांमार से मिजोरम तक का रास्ता है। इसमें समुद्र, नदी और जमीन तीनों रास्ते शामिल हैं। कोलकाता पोर्ट से समुद्र के रास्ते म्यांमार के सितवे पोर्ट तक का रास्ता, इससे आगे कालादान नदी का रास्ता और फिर म्यांमार से मिजोरम को जोड़ती सड़क। 2008 में इस प्रोजेक्ट को मंजूरी मिली थी लेकिन दूसरी योजनाओं की तरह ये भी अटकी ही रही जिसे मोदी सरकार के आने के बाद 2015 में फिर से शुरू किया गया। जिसके बाद तेजी से काम किया जा रहा है। जिसका असर ये हुआ कि पोर्ट तैयार हो गए हैं और सड़क पर काम चल रहा है। कोलकाता से सितवे पोर्ट तक की दूरी 539 किलोमीटर है। सितवे से कालादान नदी के जरिए पलेतवा का रास्ता 158 किलोमीटर का है। इसके आगे 129 किलोमीटर लंबी सड़क होगी। इसमें 88 किलोमीटर की सड़क भारत में है। इसके बन जाने के बाद कोलकाता से मिजोरम की दूरी करीब 1000 किलोमीटर कम हो जाएगी।

चीन को अखर रहा ये प्रोजेक्ट

चीन की नजरों में कालादान प्रोजेक्ट शुरू से खटक रहा है और इसलिए भारत-म्यांमर बॉर्डर पर जो उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं उन्हें चीन मदद करता रहा है। सितवे पोर्ट म्यांमार के रखाइन स्टेट में है और वहां अराकन आर्मी इस प्रोजेक्ट के लिए खतरा रही है। 2019 में अराकन आर्मी ने प्रोजेक्ट साइट से पांच भारतीयों को किडनैप कर लिया था। पिछले साल अराकन आर्मी और म्यांमार आर्मी की प्रोजेक्ट साइट के पास ही हिंसक झड़प भी हो चुकी है। लेकिन अब अराकन आर्मी प्रोजेक्ट के लिए दिक्कत खड़ी नहीं कर रही है। म्यांमार आर्मी के साथ अराकन आर्मी ने युद्ध विराम किया है और म्यांमार में तख्तापलट के बाद मिलिट्री शासन का अराकन आर्मी समर्थन भी कर रही है। असम राइफल्स के मिजोरम सेक्टर के कमांडर ब्रिगेडियर दिग्विजय सिंह ने कहा कि पिछले कुछ वक्त में ऐसी कोई घटनाएं नहीं हुई जिसमें अराकान आर्मी ने प्रोजेक्ट के काम में बाधा डाली हो। प्रोजेक्ट पर काम तय स्पीड से चल रहा है।

इस पूरे प्रोजेक्ट में कुल 33 पुल हैं जिनमें 8 भारत में बन रहे हैं

चीन के साथ जब 2017 में डोकलाम में गतिरोध हुआ था उस वक्त भी यह चिंता बढ़ गई थी कि चीन नॉर्थ ईस्ट से भारत का संपर्क काट सकता है। लेकिन कालादान प्रोजेक्ट पूरा हो जाने पर नॉर्थ ईस्ट पहुंचने का वैकल्पिक रास्ता मिल जाएगा। इस पूरे प्रोजेक्ट में कुल 33 पुल हैं जिनमें 8 भारत में बन रहे हैं। सभी पुल इस तरह बन रहे हैं जिसमें सेना के टैंक, बख्तरबंद गाड़ियां जैसे भारी सैन्य साजो सामान भी आसानी से पहुंचाए जा सकते हैं। चीन लगातार म्यामांर पर काफी रकम खर्च कर रहा है। वह म्यांमार में इकॉनमिक कॉरिडोर बना रहा है और म्यांमार में 13 बिलियन डॉलर से ज्यादा निवेश किया है। भारत भी अब म्यांमार में निवेश बढ़ा रहा है।

सामरिक रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण

यह भारत को साउथ ईस्ट एशिया से जोड़ने का छोटा रास्ता तो होगा ही जिससे व्यापार के नए मौके मिलेंगे इसके अलावा यह सामरिक रूप से भी काफी अहम है। भारत के नॉर्थ ईस्ट के राज्य जमीन से घिरे हुए हैं। नॉर्थ ईस्ट तक सड़क के जरिए पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी कॉरिडोर से जा सकते हैं। यह एकमात्र रास्ता अगर ब्लॉक हो जाए तो भारत की दिक्कतें बढ़ सकती हैं।

इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने ये कदम उठाया है और ये तो आप अच्छी तरह से जानते है कि मोदी जी ने कुछ ठान लिया तो वो फिर पूरा करके रहते है।