एक क्रांतिकारी जिसने आजादी के बाद सिगरेट कंपनी में करना पड़ा काम

 शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा…

भारत की आजादी के वक्त ये शेर नौजवानों में वो आग लगा देता था कि बड़े से बड़े अंग्रेज़ अफसर कांप उठते थे। लेकिन आजादी के बाद आजादी के दीवानों की क्या हालत हुई ये अगर आप जाने तो कही न कही आपके दिल में भी टीस होगी। किस तरह से आजाद भारत में उनके साथ गलत व्यवहार हुआ इसकी परत आज खुल रही है क्योंकि सत्ता में आज वो लोग बैठे है जो देश पर मरने वालों को सच में सम्मान की नजरों से देखते है फिर वो छोटा क्रांतिकारी हो या फिर बड़ा लेकिन आज हम पश्चिम बंगाल के एक ऐसे क्रांतिकारी के बारे में बताने जा रहे है जो आजादी के बाद अपने अस्तिव के लिये लड़ता हुआ दिखाई दिया । जी हां, हम बात कर रहे है बंगाल वर्धमान जिले के औरी गांव में पैदा हुए बटुकेश्‍वर दत्‍त की जिनकी उपेक्षा की कहानी साफ तौर पर देखने को मिल रही थी।

बटुकेश्वर दत्त की जीवनी | Batukeshwar Dutt Biography in Hindi

जब बटुकेश्‍वर दत्‍त को देना पड़ा क्रांति का सबूत

आपको यहां ये बता दे कि बटुकेश्वर दत्त वो क्रांतिकारी थे जिन्होने भगत सिंह जी के साथ मिलकर 19 साल की उम्र में अंग्रेजों की संसद पर बम फेंका था। इस घटना के बाद शहीद भगत सिंह को तो फांसी की सजा हो गई लेकिन बटुकेश्वर दत्त को बहुत कड़ी सजा दी गई, जिसे उस समय ‘काला पानी की सज़ा’ कहा जाता था और इस सज़ा में कैदी को अंडमान द्वीप पर बनाई गई सेल्युलर जेल में उम्र भर के लिए बंद कर दिया जाता था। पर जब 1947 में देश आजाद हुआ तो बटुकेश्वर दत्त जेल से निकल आए और बिहार की राजधानी पटना में रहने लगे। यहां उनकी जिंदगी बहुत मुश्किल में रही। देश के लिए बड़ी कुर्बानी का कोई सम्मान नहीं हुआ। बटुकेश्वर दत्त को परिवार पालने के लिए एक सिगरेट कंपनी में नौकरी करनी पड़ी थी। एक बार तो किसी सरकारी योजना का लाभ देने के लिए उनसे प्रमाण पत्र भी मांग लिया गया था जिससे ये पता चलता है कि उस वक्त की सरकारों ने कैसे क्रांतिकारियों के प्रति उदासीनता अपनाई थी।

बटुकेश्वर दत्त: जिन्हें इस मृत्युपूजक देश ने भुला दिया क्योंकि वे आज़ादी के  बाद भी ज़िंदा रहे

आखिर क्यो नही मिला इन लोगों को सम्मान

क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त ही नही, ऐसे कई महान क्रांतिकारी है जो आजादी के बाद या तो गुमनामी में अपना जीवन बिताते रहे या फिर सरकार ने उनके इतिहास में पर्दा डाल दिया गया। अगर आज आप बटुकेश्वर दत्त के गांव जाकर उनके घर का आलम देखे तो साफ पता चलता है कि सरकारो ने वो जगह इन क्रांतिकारियों को नही दिया जो देना चाहिये था। इसी तरह उन्नाव के बैसवारा गांव की बात करे तो दशको तक चंद्रशेखर आजाद का घर भी सरकार की उपेक्षा की कहानी बयां कर रहा था लेकिन सरकार बदलने के बाद आज कुछ हालत बदली है।

अब हमें सोचना होगा कि आखिर ऐसा क्यो हुआ, कहां हमसे गलती हुई कि हम अपने इतिहास को क्यो भूल गये। उसके पीछे सिर्फ एक कारण था और वो था कि कुछ मलाई खाने वाले लोग सत्ता में बैठ गये थे जिन्हे डर था कि अगर इन लोगों का नाम हुआ तो वो पीछे रह जायेगे। इसलिये वो उनके नाम को गुमनामी के अधेरे में धकेलते गये।