देश में सियासत के गिरते स्तर की एक झलक

पीएम मोदी बनारास के डॉक्टरों से बात करते हुए कोरोना शहीदों को याद करके भावुक हो गये। जिसके बाद सियासी गलियारो में पीएम मोदी को लेकर व्यंग के बाण छोड़े जाने लगे। ऐसा पहला मौका नहीं था जब पीएम भावुक हुए है। लेकिन देश की सियासत आज इतनी खराब हो गई है कि कुछ लोग इस मुद्दे पर भी राजनीति करते हुए नजर आये।

क्या देश के प्रधान को भावुक होने का अधिकार भी नहीं ?

देश में सियासत आज इस कदर प्रदूषित हो गई है कि अगर देश का प्रधान अपने मन की बात करे तो कुछ लोग उसे राजनीति कहते है, अगर किसी कारण वश उसकी आंख भर आये तो उसे सियासी नौटंकी का दर्जा दिया जाता है। बोला जाता है कि वो लोगों की सिंम्पेथी लेने के लिए ऐसा कर रहे है। जबकि प्रधानसेवक मोदी कई बार देश पर आई विपदा में शहीद हुए लोगों को याद करके भावुक होते है और वो इस लिये क्योकि उन्हे देश के एक एक आदमी से अपना संबध बनाया है वो हमेशा कहते आय़े है कि देश का हर नागरिक उनके परिवार का हिस्सा है और वो ऐसा नहीं कि ये बात सिर्फ कहते है बल्कि इसे बखूबी निभाते भी है। फिर महाराष्ट्र की कोई बेटी उनसे इंटरनेट की डिमांड रखती है तो वो एक अभिभावक की तरह तुरंत उसे पूरा करते है। अगर देस का कोई परिवार उन्हे शादी समारोह में निमंत्रण भेजता है तो वो उसका जवाब देते है और अपनी मौजूदगी का एहसास भी करवाते है। अब बताओ जो देश की जनता से ऐसे जुड़ा हुआ हो वो फिर जनता के दुख के वक्त कैसे खुश रह सकता है। इस बात का खुलासा वो कई बार कर भी चुके है। लेकिन जो लोग देश में आंके होने के बाद गांधारी की तरह जीवन जी रहे है उन्हे नहीं दिखता है।

सियासतबाजों को सब सियासत ही लगता है

पीएम मोदी के भावुक होने का वही मजाक उड़ा रहे है जो पहले से इस तरह से जनता के सामने नौटंकी करते आये है ऐसे कई उदाहरण है जिसमें जनता से सिंम्पेथी पाने के लिये नौटंकी करते आये है। अभी कुछ दिन पहले ही आप ने देखा होगा कि देश की एक नेता कैसे पैरो पर प्लास्टर चढ़ाकर लोगों के बीच वोट मांग रही थी लेकिन जैसे ही नतीजे सामने आये वो खुद अपने पैरो पर चलती हुई नजर आई। इसी तरह देश में वो लोग भी है जो बाटला हाउस कांड में मारे गये आतंकियों पर टेसू बहा रहे थे। क्योकि ऐसा करने से उन्हे एक विशेष वर्ग का वोट मिल जाना पक्का हो रहा था चाहे फिर इसके लिये देश को कितनीभी कीमत क्यो न चुकाना पड़े। अगर यहां पर ही नही आप उनको तो भूल ही नहीं सकते है जो सियासत के गिरगिट है कभी अपने बच्चो की कसम खाते थे कि वो सियासत में नहीं आयेगे तो कभी भगवान के नाम पर रोकर मोदी जी को कोसते थे कि ड्रामा करके ही सत्ता पा जाये।

ऐसे ही लोग जो किसी के दर्द पर भी सियासत करते है वो पीएम का दर्द क्या समझ सकते है, उस प्रधानसेवक का दर्द जो साल की शुरूआत से ही हाथ जोड़कर सभी सीएम से कहता रहा कि कोरोना गया नहीं है सावधान रहे। लेकिन उस वक्त पीएम की बैठक में कुछ शामिल नहीं हुए तो कुछ ने पीएम के भाषण को नजर अंदाज किया जिसका सबब ये हुआ कि लोगो को अपनी जान गवानी पड़ी ऐसे में जब आज देश का प्रधान एक तरफ स्थिति को संभाल रहा है तो दूसरी तरफ अपनो को लेकर भावुक हो रहा है तो उसपर सियासत सच में शर्म के लायक है