राफेल: सरकार ने अपने दस्तावेज में क्या कहा? जानिए 5 अहम बातें

मोदी सरकार  ने राफेल डील को लेकर फैसले से जुड़ी प्रक्रियाओं की जानकारी सार्वजनिक कर दी। केंद्र सरकार की ओर से विमान खरीद की प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज याचिककर्ताओं को सौंप दिए गए। इसके साथ ही केंद्र सरकार ने सुप्रिम कोर्ट को राफेल की कीमत के बारे में भी सील बंद लिफाफे में जानकारी दी। याचिकाकर्ताओं को दिए गए दस्तवाजों में सरकार कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब दिए हैं। आइए जानते हैं इससे जुड़ी पांच अहम बातें: 

बढ़ रही थी विरोधियों की ताकत, जरूरी थी डील 
अपने दस्तावेजों में केंद्र ने चीन और पाक नाम लिए बगैर बताया कि 126 मल्टिरोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट डील की लंबी प्रक्रिया के दौरान हमारे विरोधियों ने अपने पुराने विमानों को अपग्रेड किया और आधुनिक एयरक्राफ्ट शामिल किए। उन्होंने एयर-टु-एयर मिसाइल की बेहतर क्षमता को अपनाया और बड़ी संख्या में स्वदेशी विमान भी बनाए। उन्होंने अपने विमानों में रेडार और हमलावर क्षमता को भी बढ़ाया। 2010 से 2015 के दौरान हमारे विरोधियों ने 400 (20 स्क्वॉड्रन के बराबर) तक विमान अपने बेड़े में शामिल किए हैं।सरकार ने कहा कि हमारी मुकाबला करने की घटती क्षमता और विरोधियों की बढ़ती क्षमता ने स्थिति को काफी गंभीर बना दिया था। स्क्वॉड्रन की घटती संख्या के मद्देनजर इस डील को फाइनल करना जरूरी था। 

प्रक्रियाओं का हुआ पालन 

दस्तावेजों में केंद्र सरकार ने बताया कि इस डील को फाइनल करने में सभी प्रक्रियाओं का पालन किया है। सरकार ने बताया कि यूपीए के जमाने से चली आ रही रक्षा उपकरणों की खरीद प्रकिया के लिए रक्षा खरीद प्रक्रिया 2013 का ही पालन किया गया है। इस प्रक्रिया के लिए फ्रांस सरकार से करीब एक साल तक बात चली। सरकार ने दस्तावेजों में यह भी कहा कि कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्यॉरिटी (सीसीएस) से अनुमति लेने के बाद समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इसमें कहा गया है कि जब भारतीय वार्ताकारों ने 4 अगस्त 2016 को 36 राफेल जेट से जुड़ी रिपोर्ट पेश की, तो इसका वित्त और कानून मंत्रालय ने भी आकलन किया और सीसीएस ने 24 अगस्त 2016 को इसे मंजूरी दी। इसके बाद भारत-फ्रांस के बीच समझौते को 23 सितंबर 2016 को अंजाम दिया गया। 

इसलिए HAL से नहीं हुई डील 

सरकार ने अपने दस्तावेजों में यह भी बताया कि एचएएल (हिंदुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड) इस डील में क्यों पीछे रह गई। दस्तावेजों में कहा गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) इस सौदे में ऑफसेट पार्टनर बनने में नाकाम रही क्योंकि दसॉ के साथ उसके कई अनसुलझे मुद्दे थे। सरकार ने बताया कि यूपीए के समय हुई डील के मुताबिक 18 विमान तैयार हालत में मिलने थे, जबकि 108 विमान भारत में ही मैन्युफैक्चर किए जाने थे। सरकार ने इस डील को इसलिए रद्द कर दिया क्योंकि जितने समय में दैसॉ यह विमान बना रही थी, एचएएल उससे ढाई गुना ज्यादा समय मांग रही थी। ऐसे में दैसॉ एचएएल के साथ यह डील करने के लिए तैयार नहीं था। 

ऑफसेट पार्टनर के बारे में 
दस्तावेज में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा दोहराए गए आरोपों का भी जिक्र किया गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑफसेट पार्टनर के रूप में अनिल अंबानी के रिलायंस समूह की एक कंपनी का चयन करने के लिए फ्रेंच कंपनी दसॉ एविएशन को मजबूर किया ताकि उसे 30,000 करोड़ रुपये ‘दिए जा सकें।’ रिपोर्ट में कहा गया है कि रक्षा ऑफसेट दिशानिर्देशों के अनुसार, कंपनी ऑफसेट दायित्वों को लागू करने के लिए अपने भारतीय ऑफसेट सहयोगियों का चयन करने के लिए स्वतंत्र है। 

सुप्रीम कोर्ट को बताई कीमत 
राफेल की कीमतों का खुलासा करने से मना करने के बाद केंद्र सरकार ने सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में जानकारी दी। रक्षा मंत्रालय से एक सीलबंद लिफाफा सीधे सुप्रीम कोर्ट के सेक्रटरी जनरल रवींद्र मैथानी के दफ्तर ले जाया गया, इसे रजिस्ट्री में भी दर्ज नहीं किया गया। यहां तक कि अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल को भी इस रिपोर्ट की जानकारी नहीं दी गई। एक वरिष्ठ विधि अधिकारी ने बताया कि विभिन्न आपत्तियों के मद्देनजर सौदे के मूल्य का ब्यौरा न्यायालय में एक सीलबंद लिफाफे में दिया गया है।
 

Originally published at Navbharat Times