25 जून भारतीय लोकतंत्र के अध्याय की काली तारीख जिसे मिटाया नहीं जा सकता

आज के माहौल में देश के युवा एक शब्द जरूर सुनते हैं कि मोदी राज में भारत में आपातकाल जैसे हालात हैं, कोई सरकार का विरोध नहीं कर सकता है और ना ही इस वक्त खुलकर कुछ बोल सकता है। लेकिन आज के युवाओं को हम बताने जा रहे हैं कि आखिर हकीकत में आपातकाल क्या था जी हां आज 25 जून है और आज के दिन 1975 में देश में सिर्फ सत्ता मोह के चलते आपातकाल थोपा गया था उस दौर में आम जनता के साथ साथ विपक्ष के नेता के साथ क्या क्या हुआ था उसकी पूरी कहानी हम सुनाते हैं।

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आपातकाल के वो काले दिन

25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था। तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल था। आपातकाल लगने के बात देश में विपक्ष को जेल में डाल दिया गया था दोस्तो ऐसा नहीं था कि केवल बड़े नेताओं को जेल में बंद किया गया था बल्कि शहर गांव और कसबों के छोटे से छोटे नेताओ को जेल में बंद किया गया या फिर उन्हे पुलिस की प्रताड़ना को झेलना पड़ा। इसके साथ हर वो आदमी जिसने सरकार की बात नहीं मानी उसपर पुलिस के लाठी चली। ऐसा ही एक किस्सा सुल्तानपुर के गांव का है जहां डीएम के सामने सरकार की बात ना मानने के चलते 13 लोगों को पुलिस की गोली से मौत के घाट उतार दिया। आज के युवा जो छोटी छोटी बात पर लोकतंत्र की दुहाई देकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलकर सरकार पर लोकतंत्र की हत्या करने का आरोप लगाते हैं उनको पता होना चाहिये कि उस वक्त मीडिया और अखबारों को बैन कर दिया गया था जो अवार्ड वापसी गैंग जरा जरासी बात पर सरकार पर गर्म होते हैं उन्हें पता होना चाहिये कि उस दौर में किशोर दा को सरकारी रेडियो और टीवी पर इस लिये बैन कर दिया गया था क्योंकि उन्होने सरकारी आदेश को नही माना था भगत सिंह सहित कई लोगो की फिल्मो पर रोक लगा दी गई थी। इसके साथ साथ सबसे ज्यादा मुस्लिमो और दलितो के साथ अत्याचार किया गया जब उनकी जबरन नसबंदी करवाई गई। ऐसे कई मामले हैं जिन्हे सोचकर ही आज भी आत्मा हिल जाती है।

आज के युवाओं को इतिहास जानना बहुत जरूरी

आप सोच रहे होगे भारत के इतिहास के वो काले दिन आज हम क्यों बता रहे हैं लेकिन वो हमने इसलिये बताया है क्योंकि आज के युवा जान सके कि जो आज मोदी सरकार के कामकाज पर सवाल खड़ा करके आपातकाल से बुरा दौर चिल्लाते हैं उनकी हकीकत बताई जा सके कि उनका दिल कितना काला है। वैसे वो अभी भी नहीं सुधरे हैं इसका उदाहरण भी देखने को मिलता है जब छत्तीसगढ़ में गांवो में बिजली की खबर दिखाने पर मीडिया के रिपोर्टर पर कार्यवाही की जाती है उसे परेशान किया जाता है। ऐसा नहीं है कि ये पहला मामला है , पंजाब हो या राजस्थान वहां पर भी आये दिन ऐसे मामले दिखाई और सुनाई देते हैं। इसके साथ-साथ हर देश विरोधी आंदोलन को हवा दी जाती है और सत्ता में अब तो आने के लिये कोरोना माहामारी से निपटने की जगह टूलकिट का प्रयोग करके इसे बढ़ाने की कोशिश की जाती है और फिर सफेद कुर्ता पहनकर ये बताया जाता है कि उनका दामन कितना साफ है। जबकि पहले भी उनका दिल काला था और आज भी उनका दिल काला है। ऐसे में आज के युवाओ को हमारे कल के बारे में जानना बहुत जरूरी है क्योंकि लोकतंत्र को देश में फिर से जिंदा करने के लिये आज के सत्ताधारियों ने आजादी की दूसरी लड़ाई लड़ी थी ।

हालांकि उनकी इस लड़ाई को कुछ इतिहासकारों ने चाटुकारिता में दबाकर हमेशा एक गलत इतिहास पढ़ाया और ये बताने की कोशिश किया कि आपातकाल में देश में बहुत कुछ सुधार भी हुए जबकि हकीकत कुछ और थी। जिसे आज हमने बया किया है।