‘19 जनवरी 1990’ याद है न, नही तो याद कर लीजिये

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30 साल पहले 19 जनवरी 1990 देश के इतिहास का वो काला दिन जिस दिन कश्मीर से लाखों पंडितों को या तो मुस्लिम बनने का फरमान जारी हुआ या फिर कश्मीर छोड़कर जाने का पैगाम दिया गया। हालाकि इसके बाद कश्मीर में जिस तरह से कत्लेआम हुआ वो जगजाहिर है। लेकिन इतिहास की काली स्यहा वाले इस दिन पर 30 साल से कोई दरबारी मीडिया न कुछ कहता है और न देश के बड़े बड़े बुद्धिजीवी कुछ बोलते है। पर क्यो ये सवाल आज उठाना लाजमी है?

लाखों की संख्या में बेघर हो गये कश्मीरी पंडित

साल 1947 भारत की आजादी का साल, या यू कहे भारत के बंटवारे का साल, तो गलत न होगा, क्योकि मुल्क बंट चुका था और भुगोल के मानचित्र में पाकिस्तान नाम का एक देश का चित्र बन चुका था। लेकिन टू नेशन थ्योरी पर बने पाकिस्तान अमन और विकास के रास्ते पर न चलकर भारत में आशांति फैलाने की कोशिश में जुट गया। खासकर कश्मीर पर उसकी गंदी नजर आजादी के वक्त से ही पड़ने लगी थी. लेकिन सही मायने में आग लगाने का मौका उसे 1990 में मिला जब कांग्रेस से समर्थित फारुक अब्दुला की सरकार घाटी में थी। कश्मीर में घुसपैठ करके माहौल खराब करने में उस वक्त सबसे बड़ी बाधा वहां रह रहे कश्मीरी पंडित थे। इस लिये पाकिस्तान और कुछ देश के सत्तासुख चाहने वालों ने कश्मीर पंडितो पर हमला बोलना शुरू कर दिया। लेकिन गजब तो तब हुआ जब 19 जनवरी 1990 को पहली बार कश्मीर से पंडितों को बाहर जाने का फरमान जारी किया गया। आलम ये हुआ कि मजिस्द से ऐलान किया गया कि कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडितो या तो इस्लाम कबूल करो या कश्मीर छोड़ कर चले जाओ।

अगर उस दिन का मंजर आज भी आँखो के सामने आ जाता है, तो रुह कांप उठती है। घाटी की गली गली से लोग भाग रहे थे, मकान जल रहे थे, महिलायें अपनी आबरू बचाने की हर संभव कोशिश कर रही थी और ये सब हो रहा था हमारे ही मुल्क में लेकिन हम इतने बेबस थे कि कुछ कर ही नही पा रहे थे। कश्मीर से आये ऐसे ही पंडितों की कहानी अगर सुन ली जाये तो आंखे नम नही होती बल्कि खून के आँसू से सन जाती है।

दरबारी मीडिया और बुद्धिजीवी क्यो रहते है मौन?

शर्म तो तब आती है, जब कश्मीर को लेकर आज के कुछ बुद्धिजीवी टुकड़े टुकड़े गैंग के साथ खड़े दिखते है। वो कश्मीर पंडितों के साथ हुए बर्बरता पर कुछ नही बोलते और न ही लिखते है। अफजल गुरू के फांसी वाले दिन तो खूब समाजवाद की बातो पर सभा करते है, लेकिन 19 जनवरी के दिन गायब ही रहते है। इसी तरह दरबारी मीडिया भी खामोश रहकर सिर्फ सरकार के कामकाज की खामिया दिखाने में लगे रहते है,पर सवाल ये उठता है कि आखिर क्यो इस मुद्दे पर वो खामोश रहते है? मजे की बात ये है, कि जो लोग इस मुद्दे पर अपनी बात रखना चाहते है, उनपर धर्मनिरपेक्ष न होने की बात कहकर ये लोग हमला भी बोलते है। लेकिन अब उनसे जवाब लेते का वक्त आ गया है।

अब हमे बदलना पड़ेगा और सोचना पड़ेगा कि हम इस सोच से बाहर निकले या फिर इस सोच के लोगों को ये समझाये कि उनकी सोच के चलते देश ने क्या खोया है। ऐसे में मोदी सरकार के 6 महीनों के फैसलों को अगर आप देखेंगे तो ये साफ महसूस होगा कि देश आज सही रास्तों की तरफ निकल पड़ा है. बस इसे चलते ही रहना है जिससे भारत वो देश बन सके, जिसको लेकर आजादी के परवाने निकले थे।

 


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